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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आज एक अहम न्यायिक फैसला सुनाया है जिसमें उसने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों में WhatsApp चैट और कॉल रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है, बशर्ते वे विवाद से सीधे जुड़े हों और उनकी प्रासंगिकता न्यायिक प्रक्रिया में साबित हो सके। यह निर्णय डिजिटल युग में निजता के अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई (fair trial) के बीच संतुलन की न्यायिक व्याख्या का प्रतिनिधित्व करता है।

यह मामला रायपुर के एक दंपती के बीच चल रहे तलाक के विवाद से जुड़ा था जिसमें पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए व्हाट्सएप चैट और कॉल रिकॉर्डिंग्स को पेश करने का अनुरोध किया था। पति की ओर से फैमिली कोर्ट में यह सबूत पेश करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन पत्नी ने इसे चुनौती देते हुए कहा कि यह उसके निजता के अधिकार का उल्लंघन है क्योंकि डेटा उसकी अनुमति के बिना प्राप्त किया गया था।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बेंच ने इस चुनौती पर विचार करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन यह पूर्ण और असीमित नहीं है। न्यायालय ने कहा कि जब किसी मामले में सच सामने लाना आवश्यक होता है और वह सूचना विवाद को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, तो उसे केवल निजता के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और डिजिटल साक्ष्यों को वैवाहिक विवादों में मान्य माना।

न्यायालय ने फैमिली कोर्ट एक्ट की धारा 14 का भी उल्लेख करते हुए कहा कि पारिवारिक अदालतों को ऐसा कोई भी साक्ष्य स्वीकारने का अधिकार है जो विवाद को सुलझाने में मदद करे, भले ही उसे तकनीकी रूप से भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत सत्यापन या प्रमाणन के बिना ही प्राप्त किया गया हो। न्यायालय का यह रुख यह संकेत देता है कि डिजिटल युग में मोबाइल डेटा, चैट और वार्तालाप रिकॉर्डिंग जैसे डिजिटल प्रूफ अब पारिवारिक मामलों में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

विशेष रूप से, अदालत ने निजता के अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के बीच संतुलन पर जोर दिया। न्यायालय ने कहा कि जब दो संवैधानिक अधिकार आमने-सामने हों, तो निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार अधिक प्रासंगिक होता है, खासकर जब डिजिटल साक्ष्य सीधे विवाद से जुड़े हों और न्यायलय को सच्चाई तक पहुंचने में मदद करें।

यह फैसला डिजिटल समय में पारिवारिक विवादों में डिजिटल साक्ष्यों के बढ़ते महत्व को रेखांकित करता है। न्यायालय ने संकेत दिया है कि केवल तकनीकी कारणों से डिजिटल सबूतों को खारिज करना अब न्याय के उद्देश्य से विपरीत है, और यदि साक्ष्य प्रासंगिक, विश्लेषण-योग्य और विवाद से सीधे जुड़े हों, तो उन्हें स्वीकार करना न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा होना चाहिए।

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