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अमेरिका-ईरान सीजफायर पर चीन की पहली प्रतिक्रिया

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अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर) के बाद अब दुनिया भर से प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में चीन ने भी अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए साफ किया है कि वह मिडिल ईस्ट में शांति स्थापित करने के लिए “रचनात्मक भूमिका” निभाने के लिए तैयार है। चीन के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वह इस युद्धविराम का स्वागत करता है और सभी पक्षों से अपील करता है कि वे संवाद और कूटनीति के जरिए स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ें।

चीन ने यह भी दावा किया कि उसने इस संघर्ष को रोकने के लिए पर्दे के पीछे प्रयास किए हैं और वह आगे भी शांति प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाएगा। बीजिंग का कहना है कि सैन्य टकराव किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है, इसलिए राजनीतिक और कूटनीतिक रास्ता ही सबसे बेहतर विकल्प है।

दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच यह दो हफ्तों का सीजफायर पाकिस्तान की मध्यस्थता से संभव हो पाया है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने की शर्त भी शामिल है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है, इसलिए इसके खुलने से दुनिया भर में ऊर्जा संकट कम होने की उम्मीद जताई जा रही है।

चीन लंबे समय से खुद को एक वैश्विक शांति दूत के रूप में पेश करने की कोशिश करता रहा है। ईरान के साथ उसके मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं, खासकर तेल व्यापार के क्षेत्र में। ऐसे में इस संघर्ष में उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन ने ईरान को बातचीत की मेज पर लाने में भी भूमिका निभाई, जिससे यह सीजफायर संभव हो सका।

हालांकि, चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह किसी भी सैन्य कार्रवाई के पक्ष में नहीं है और वह क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सभी देशों से संयम बरतने की अपील करता है। उसका जोर इस बात पर है कि यह युद्ध जल्द से जल्द समाप्त हो और मिडिल ईस्ट में दीर्घकालिक शांति स्थापित हो सके।

इस बीच, दुनिया के कई बड़े देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस सीजफायर का स्वागत किया है और इसे “तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम” बताया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल अस्थायी राहत है और असली चुनौती स्थायी शांति समझौते तक पहुंचने की है।

कुल मिलाकर, चीन की यह प्रतिक्रिया दिखाती है कि वह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी कूटनीतिक ताकत को मजबूत करना चाहता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चीन वास्तव में इस संघर्ष को स्थायी रूप से खत्म कराने में अहम भूमिका निभा पाता है या नहीं।

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