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रोज 37 हजार हाथियों के वजन जितना कचरा पैदा कर रहा भारत

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भारत में बढ़ते कचरे का संकट अब सिर्फ शहरों की सफाई तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पर्यावरण, स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में ठोस कचरा प्रबंधन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने साफ किया है कि बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाले संस्थानों और कंपनियों को नियमों का पालन करना ही होगा। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है, जिसमें बिजली और पानी की आपूर्ति काटना भी शामिल है। 

सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को देश के सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने जिलों में Bulk Waste Generators यानी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करने वाली संस्थाओं की पहचान करें। इसके लिए उन्हें 6 हफ्ते का समय दिया गया है। अदालत ने कहा कि ऐसे संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके यहां पैदा होने वाले कचरे को अलग-अलग किया जाए, उसका उचित भंडारण किया जाए और फिर उसे निर्धारित व्यवस्था के तहत सौंपा जाए। यह जिम्मेदारी केवल नगर निगम या स्थानीय प्रशासन की नहीं होगी, बल्कि कचरा पैदा करने वाली बड़ी संस्थाओं की भी होगी।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई Bulk Waste Generator Solid Waste Management Rules, 2026 का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। जिला कलेक्टर के आदेश पर ऐसे संस्थान की बिजली और पानी की आपूर्ति अस्थायी रूप से बंद की जा सकती है। आपूर्ति तभी बहाल होगी जब संबंधित संस्था नियमों का पालन करने का प्रमाण या सर्टिफिकेट प्रस्तुत करेगी। इस निर्देश का उद्देश्य बड़े पैमाने पर कचरा पैदा करने वाले संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी के प्रति जवाबदेह बनाना है।

भारत में कचरे की मात्रा कितनी तेजी से बढ़ रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश में हर दिन पैदा होने वाला ठोस कचरा बेहद विशाल मात्रा में है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इसे लगभग 37 हजार हाथियों के कुल वजन के बराबर बताया गया है। बढ़ती आबादी, तेजी से हो रहे शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और खपत में वृद्धि के कारण शहरों में कचरे का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कचरे को स्रोत पर ही अलग नहीं किया गया और उसके वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण की व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण की स्थिति में सुधार भी हुआ है। रिपोर्ट में PIB के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि 2014 में देश में केवल 16% कचरे का वैज्ञानिक तरीके से प्रसंस्करण हो रहा था, जबकि मई 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 81% हो गया। इसका मतलब है कि कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में क्षमता और बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है, लेकिन कचरे की कुल मात्रा में लगातार वृद्धि के कारण चुनौती अभी भी बहुत बड़ी बनी हुई है।

इसी समस्या से निपटने के लिए 2026 में नए Solid Waste Management Rules लागू किए गए हैं। इन नियमों में कचरे को स्रोत पर अलग करने, कचरे को कम करने, दोबारा इस्तेमाल और रिसाइक्लिंग को बढ़ावा देने तथा कचरे के वैज्ञानिक प्रसंस्करण पर अधिक जोर दिया गया है। नए नियमों में Bulk Waste Generators की जिम्मेदारियों को भी ज्यादा स्पष्ट और कठोर बनाया गया है। नियमों का उद्देश्य केवल कचरे को उठाकर किसी लैंडफिल तक पहुंचाना नहीं, बल्कि कचरे के पूरे जीवनचक्र को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना है।

भारत के बड़े शहरों में लैंडफिल और डंपिंग साइट पहले से ही भारी दबाव में हैं। बड़ी मात्रा में जमा कचरा जमीन, हवा और पानी को प्रभावित करता है। कचरे के सड़ने से निकलने वाली गैसें और खुले में कचरा जलाने से होने वाला धुआं भी पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या पैदा करता है। इसके अलावा, प्लास्टिक और अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल कचरा नालियों और जल स्रोतों को प्रभावित करता है। इसलिए केवल कचरा उठाने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अलग करना, प्रोसेस करना और उपयोगी सामग्री को दोबारा अर्थव्यवस्था में शामिल करना भी जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशों का सबसे बड़ा संदेश यही है कि कचरा प्रबंधन की जिम्मेदारी सिर्फ सफाई कर्मचारियों या नगर निकायों पर नहीं डाली जा सकती। जो संस्थान बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करते हैं, उन्हें भी उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी उठानी होगी। बिजली-पानी काटने जैसी कार्रवाई की चेतावनी यह संकेत देती है कि अब नियमों के उल्लंघन को केवल मामूली प्रशासनिक चूक के तौर पर नहीं देखा जाएगा। आने वाले 6 हफ्तों में जिला प्रशासन द्वारा Bulk Waste Generators की पहचान और उसके बाद नियमों के पालन की निगरानी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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