
कर्नाटक की राजनीति में जातिगत सर्वे और आरक्षण को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य की जातिगत सर्वे रिपोर्ट को लागू करने के साथ-साथ दलितों, पिछड़े वर्गों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण बढ़ाकर 75% करने की मांग की है। उनकी इस मांग ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के सामने राजनीतिक और सामाजिक दोनों तरह की चुनौती खड़ी कर दी है।
सिद्धारमैया ने 6 सितंबर को बेंगलुरु में पिछड़ा वर्ग महासंघ के एक कार्यक्रम में कहा कि सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 75% आरक्षण जरूरी है। उनका तर्क है कि सरकारी नौकरियों और राजनीतिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व आबादी के अनुपात के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने लोकसभा और विधानसभा में भी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व की वकालत की है।
दरअसल, कर्नाटक में जातिगत सर्वे का मुद्दा काफी पुराना है। 2015 में तत्कालीन सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल में सामाजिक-आर्थिक और शिक्षा सर्वे कराया गया था। बाद में इस रिपोर्ट को लेकर कई समुदायों की आपत्तियां सामने आईं और इसे सार्वजनिक तौर पर लागू करने को लेकर विवाद बना रहा। सिद्धारमैया के दोबारा सत्ता में आने के बाद इस मुद्दे को फिर से आगे बढ़ाया गया और राज्य में नए सिरे से जातिगत आंकड़े जुटाने की प्रक्रिया भी हुई।
अब सिद्धारमैया चाहते हैं कि राज्य सरकार इस सर्वे रिपोर्ट को लागू करे और उसके आधार पर आरक्षण तथा प्रतिनिधित्व की नीतियों में बदलाव किया जाए। दूसरी ओर, इस मुद्दे का सीधा राजनीतिक असर कांग्रेस के भीतर भी दिखाई दे सकता है। सिद्धारमैया लंबे समय से AHINDA यानी पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को साथ लेकर चलने वाली राजनीति के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। ऐसे में 75% आरक्षण की उनकी मांग को सामाजिक न्याय के मुद्दे के साथ-साथ कर्नाटक की राजनीति में उनके प्रभाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
इस पूरे विवाद में 2027 की जनगणना भी महत्वपूर्ण हो गई है। कांग्रेस लगातार जातिगत आंकड़ों को सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के समान बंटवारे से जोड़ रही है। पार्टी का तर्क है कि अलग-अलग समुदायों की वास्तविक आबादी का आंकड़ा सामने आने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि सरकारी योजनाओं, नौकरियों और संस्थानों में किस वर्ग को कितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
हालांकि, 75% आरक्षण की मांग को लागू करना आसान नहीं होगा। आरक्षण की मौजूदा सीमा, अलग-अलग समुदायों के हित और कानूनी प्रावधान इसके रास्ते में बड़ी चुनौती हैं। इसके अलावा कर्नाटक में प्रभावशाली समुदायों के बीच भी जातिगत सर्वे के आंकड़ों और उनके आधार पर संभावित आरक्षण बदलाव को लेकर अलग-अलग मत हैं। इसलिए सरकार के सामने सामाजिक न्याय के वादे और विभिन्न समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती रहेगी।
राजनीतिक तौर पर यह मुद्दा मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए भी अहम है। पहले जातिगत सर्वे रिपोर्ट को लेकर उनका रुख सिद्धारमैया से अलग माना जाता था, लेकिन बाद में शिवकुमार ने भी सरकार द्वारा कराए गए सामाजिक-आर्थिक सर्वे को लागू करने की प्रतिबद्धता जताई। ऐसे में अब सिद्धारमैया की ओर से 75% आरक्षण की स्पष्ट मांग कांग्रेस सरकार पर इस मुद्दे पर आगे बढ़ने का दबाव बढ़ा सकती है।
कर्नाटक कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अगर पार्टी सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख मुद्दा बनाती है, तो राज्य में सिद्धारमैया की 75% आरक्षण की मांग को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होगा। वहीं, मांग को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ने पर कई प्रभावशाली समुदायों के हितों और कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। यही वजह है कि जातिगत सर्वे और आरक्षण का मुद्दा आने वाले समय में कर्नाटक कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक सवाल बन सकता है।



