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अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत डुबोया, भारत की भूमिका पर उठे सवाल

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मध्य-पूर्व में जारी अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के बीच हिंद महासागर में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार 4 मार्च 2026 को अमेरिकी नौसेना की एक पनडुब्बी ने ईरान के युद्धपोत IRIS Dena को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबो दिया। यह हमला श्रीलंका के गॉल तट से लगभग 40 समुद्री मील दूर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हुआ। इस हमले में कम से कम 87 ईरानी नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को बचा लिया गया और कई अन्य अब भी लापता बताए जा रहे हैं।

बताया जा रहा है कि यह ईरानी युद्धपोत भारत में आयोजित एक बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास में भाग लेने के बाद अपने देश लौट रहा था। यह जहाज विशाखापत्तनम में आयोजित Milan-2026 और इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू जैसे कार्यक्रमों में शामिल हुआ था। इसी दौरान हिंद महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी ने इसे टारगेट किया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने बाद में पुष्टि की कि जहाज को Mark-48 टॉरपीडो से निशाना बनाया गया था। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार है जब अमेरिकी पनडुब्बी ने किसी दुश्मन युद्धपोत को सीधे टॉरपीडो से डुबोया।

हमले के बाद श्रीलंका की नौसेना ने तुरंत राहत और बचाव अभियान शुरू किया। समुद्र से कई शव बरामद किए गए और बचे हुए नाविकों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। घायल सैनिकों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। इस घटना के बाद एक अन्य ईरानी जहाज ने भी श्रीलंका से मदद मांगी, जिसके बाद वहां की सरकार ने मानवीय आधार पर उसके क्रू को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया।

इस पूरे मामले ने भारत को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है, क्योंकि जिस युद्धपोत को डुबोया गया वह कुछ दिन पहले ही भारत द्वारा आयोजित नौसैनिक अभ्यास में शामिल हुआ था। ऐसे में भारत की कूटनीतिक स्थिति और क्षेत्रीय भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भारत के कई पूर्व सैन्य अधिकारियों और विशेषज्ञों ने कहा है कि हिंद महासागर के आसपास बढ़ते सैन्य तनाव से भारत की रणनीतिक स्थिति पर असर पड़ सकता है और सरकार को इस पर स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

देश की राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार से पूछा है कि हिंद महासागर के पास हुई इस बड़ी सैन्य कार्रवाई पर भारत का आधिकारिक रुख क्या है और सरकार अब तक चुप क्यों है। उनका कहना है कि यह केवल अंतरराष्ट्रीय मुद्दा नहीं बल्कि भारत की सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन से जुड़ा मामला भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना संकेत देती है कि अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा संघर्ष अब मध्य-पूर्व से निकलकर समुद्री क्षेत्रों तक फैल चुका है। यदि स्थिति इसी तरह बढ़ती रही तो हिंद महासागर और आसपास के समुद्री मार्ग भी युद्ध के प्रभाव में आ सकते हैं, जिसका असर वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ सकता है।

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