
ईरान में विरोध-प्रदर्शन (protests) का संकट दिन-प्रतिदिन गहरा होता जा रहा है, और इस संघर्ष ने अब घरेलू विद्रोह से अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक टकराव का रूप ले लिया है। देशभर में महंगाई, बेरोज़गारी और सरकार के खिलाफ जारी प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा बलों की कठोर कार्रवाई में अब तक हजारों लोगों के मारे जाने के आंकड़े सामने आए हैं, जिनपर दुनियाभर में चिंता और आलोचना बढ़ रही है। सरकारी और स्वतंत्र स्रोतों के बीच मौतों के आंकड़ों में बड़ा अंतर है, लेकिन कई रिपोर्टें इस बात पर इशारा करती हैं कि यह ईरान के इतिहास में Protest crackdown का एक बेहद घातक दौर है।
ईरानी सरकार के अनुसार विरोध प्रदर्शन के दौरान लगभग 5,000 लोगों की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन स्वास्थ्य अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अस्पताल डेटा के विश्लेषण यह संकेत देते हैं कि वास्तविक संख्या यह आंकड़ा कहीं अधिक हो सकती है — कुछ आँकड़ों में यह 30,000 से ऊपर भी बताई जा रही है। इन हिंसक प्रदर्शनकारियों में शामिल नागरिकों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव के बीच इंटरनेट ब्लैकआउट और मीडिया पर पाबंदी ने समस्या को और गहरा कर दिया है और सत्यापित आंकड़ों का पता लगाने को कठिन बना दिया है।
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई ने इन घटनाओं को “घटनाओं में विदेशी हस्तक्षेप” के रूप में पेश करते हुए आरोप लगाया कि विरोध और हिंसा के लिए अमेरिका और अन्य बाहरी ताकतें जिम्मेदार हैं। खामेनेई ने इस हिंसा के लिए उन पर कटु बयान दिए और कहा कि देश में अशांति फैलाने वाले तत्वों को कड़ी कार्रवाई का सामना करना चाहिए।
दूसरी ओर, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी शासन पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा जारी रखने पर चेतावनी दी है और खुले तौर पर कहा है कि अगर व्यापक दमन और फांसी की सजा जारी रही, तो अमेरिका कड़ी प्रतिक्रिया दिखाने को तैयार है। ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों से आंदोलन जारी रखने और संस्थानों पर कब्ज़ा करने का भी आह्वान किया है, जिससे तेहरान-वॉशिंगटन के बीच तनाव और बढ़ा है।
इन सबके बीच ईरान का निर्वासित शाही परिवार का उत्तराधिकारी रज़ा पहलवी (Reza Pahlavi) भी विश्व स्तर पर खासी चर्चा में हैं। उन्होंने अमेरिकी समर्थन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि विरोध प्रदर्शनों का समर्थन “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक” है और उन्हें डर है कि अगर पर्याप्त समर्थन नहीं मिला तो ईरान में हिंसा और मौतों की संख्या और बढ़ेगी।
इस व्यापक संकट ने न केवल ईरान के आंतरिक राजनीतिक ढांचे को चुनौती दी है, बल्कि मध्य पूर्व में अमेरिका-ईरान तनाव को भी गहरा कर दिया है, जहाँ अमेरिका का सैन्य संकुचन और कूटनीतिक दबाव दोनों जारी हैं तथा भविष्य में संभावित सैन्य मुठभेड़ों की आशंका जताई जा रही है।



