
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच कूटनीतिक और रणनीतिक संबंधों में एक नए मोड़ की झलक दिखी है जब भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और **अमेरिका के विदेश सचिव मार्को रुबियो ने 13 जनवरी 2026 को महत्वपूर्ण फोन पर बातचीत की। इस बातचीत का केंद्र बिंदु भारत में हाल ही में पारित हुए “Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India” बिल पर अमेरिका की रुचि और इसके संभावित द्विपक्षीय सहयोग को लेकर रहा। रुबियो ने भारत को इस नए न्यूक्लियर एनर्जी कानून के लिए बधाई दी और कहा कि इससे दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर सहयोग के अवसर और अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में निवेश के रास्ते खुल सकते हैं।
बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने केवल न्यूक्लियर ऊर्जा ही नहीं बल्कि व्यापार, महत्वपूर्ण खनिज, रक्षा और ऊर्जा सहयोग जैसे व्यापक मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। जयशंकर ने संवाद को “अच्छी बातचीत” बताते हुए कहा कि दोनों पक्षों ने इन सभी विषयों पर संपर्क बनाए रखने और आगे बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई। इस बातचीत से यह स्पष्ट होता है कि भारत-अमेरिका संबंधों में ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने की कोशिशें जारी हैं।
विशेष रूप से व्यापार के संदर्भ में, भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से ट्रेड डील को लेकर वार्ता चल रही है, जिसका उद्देश्य टैरिफ बाधाओं को कम करना और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ाना है। पिछले कुछ सत्रों में बातचीत सफल नहीं हो पाई थी, लेकिन इस नवीनतम संवाद से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष जल्द ही व्यापार समझौते पर भी सहमति के करीब पहुंच सकते हैं। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $500 बिलियन तक ले जाने का लक्ष्य रखा है, और इसी लक्ष्य को पाने के लिए ऊर्जा तथा रक्षा खरीद में भी अमेरिका-भारत सहयोग को बढ़ावा देने की इच्छा जताई गई है।
न्यूक्लियर ऊर्जा क्षेत्र में भारत के इस नए बिल ने अमेरिका में खास दिलचस्पी जगाई है क्योंकि इससे नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन को विकसित करने, उन्नत तकनीकों के उपयोग को प्रोत्साहित करने और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने की संभावनाएँ बढ़ती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न केवल ऊर्जा क्षेत्र में बल्कि तकनीकी, आर्थिक और सबसे बढ़कर रणनीतिक गठजोड़ में भी दोनो देशों के बीच मजबूती आएगी।
भारत के विदेश मंत्री ने बातचीत के बाद सोशल मीडिया पर भी इस डायलॉग के सकारात्मक पहलुओं को साझा किया, जिसमें उन्होंने अमेरिका के साथ साझेदारी को व्यापक और रणनीतिक रूप से आगे बढ़ाने के संकल्प को दोहराया। दोनों देशों ने Indo-Pacific क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुले माहौल की प्रतिबद्धता को भी साझा किया, जो वैश्विक सुरक्षा और सामरिक स्थिरता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि अभी तक कोई ठोस समझौता समाप्त नहीं हुआ है, इस बातचीत ने दोनों पक्षों के बीच विश्वास, संवाद और सहयोग की दिशा में एक सकारात्मक संकेत प्रस्तुत किया है। न्यूक्लियर ऊर्जा, व्यापार, रक्षा और अन्य रणनीतिक मुद्दों पर समन्वित तरीके से काम करने का यह प्रयास भविष्य में भारत-अमेरिका रिश्तों को और अधिक गहरा और परिपक्व बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि भारत का न्यूक्लियर एनर्जी बिल न केवल घरेलू ऊर्जा नीति का हिस्सा है बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय सहयोग, विशेषकर अमेरिका के साथ ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा क्षेत्रों में साझेदारी को मजबूत करने का एक बड़ा आधार भी बन सकता है।



