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कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष जारी

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कर्नाटक की राजनीति इन दिनों कांग्रेस पार्टी के अंदर चल रहे नेतृत्व विवाद की वजह से सुर्खियों में है। मुख्यमंत्री एस. सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार के बीच सत्ता-साझेदारी (power sharing) को लेकर खींचतान की खबरें पिछले कई महीनों से आ रही हैं, और आज भी इसी राजनीतिक उथल-पुथल का विषय बना हुआ है। भले ही दोनों नेता मिलकर सरकार चला रहे हों, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही चर्चाएँ और अटकलें मीडिया और पार्टी के भीतर राजनीति का बड़ा मुद्दा बनी हुई हैं।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में बयान दिया है कि नेतृत्व परिवर्तन या सत्ता-साझेदारी पर अंतिम निर्णय कांग्रेस के “हाईकमान” यानी राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा लिया जाएगा, और वही निर्णय पार्टी के सभी नेताओं द्वारा स्वीकार किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पार्टी हाईकमान उन्हें बुलाता नहीं है, वे केवल उसी के निर्णय का पालन करेंगे और इस विषय पर बार-बार टिप्पणी नहीं करेंगे। सिद्धारमैया ने मीडिया से कहा कि वे हाईकमान के निर्णय के बिना कोई अलग से घोषणा या टिप्पणी नहीं करना चाहते और यदि पार्टी चाहे, वे दिल्ली जाकर राष्ट्रीय नेताओं से बात करेंगे।

यह बयान ऐसे समय आया है जब कर्नाटक कांग्रेस के अंदर यह मुद्दा कई महीनों से उभर रहा है। कुछ कांग्रेस विधायक और शिवकुमार समर्थक नेताओं का दावा है कि सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच 2.5-2.5 साल के पावर-शेयरिंग फॉर्मूले पर सहमति थी, जिसमें सिद्धारमैया पहले ढाई साल Chief Minister बने, और बाद के ढाई साल के लिए शिवकुमार मुख्यमंत्री बनेंगे — लेकिन इस समझौते की पुष्टि हाईकमान ने कभी आधिकारिक रूप से नहीं की।

सत्ता-साझेदारी को लेकर यह चर्चाएँ तब और तेज हुईं जब कांग्रेस सरकार ने अपने पाँच साल के कार्यकाल के बीच दो-ढाई साल पूरा कर लिया, जिससे शिवकुमार और उनके समर्थकों ने यह पूछना शुरू कर दिया कि अब “बारी किसकी है?” हालांकि शिवकुमार ने सार्वजनिक तौर पर कई बार कहा है कि उनकी प्राथमिकता पार्टी और उच्च कमान की आज्ञा का पालन करना है, और वे कोई अलग रुख नहीं रख रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि यह मामला सिर्फ दो नेताओं के बीच की खींचतान नहीं है, बल्कि कांग्रेस के अंदरूनी समीकरण, सामाजिक और जातीय राजनीति के प्रभाव, और पार्टी हाईकमान की भूमिका जैसे कई पैमानों पर विचार का विषय बन चुका है। पार्टी में यह संदेश भी गया है कि किसी भी निर्णय से पहले राष्ट्रीय नेतृत्व को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि पार्टी की एकता और आगामी चुनावों में उसके प्रदर्शन पर असर न पड़े।

इन सबके बीच यह भी देखा जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ विधायकों का रुख अलग-अलग है, और पार्टी के अंदरूनी हलचल के बावजूद सरकार का कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी कहा है कि उनकी प्राथमिकता सरकार चलाना और जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देना है, और इसी पर पार्टी को आगे बढ़ना चाहिए। हालांकि यह स्पष्ट है कि कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व और सत्ता-साझेदारी की चर्चाएँ अभी ठंडी नहीं पड़ीं हैं, और हाईकमान के फैसले के बाद ही आने वाले दिनों में किसी ठोस परिणाम की उम्मीद की जा सकती है।

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