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महाकाल स्टैंडर्ड टाइम क्या है?

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खबर (हिंदी में विस्तृत विवरण):
दुनिया में समय तय करने के मौजूदा सिस्टम ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) को बदलने की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है, जब केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan ने “महाकाल स्टैंडर्ड टाइम (MST)” को वैश्विक समय मानक बनाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने यह बात मध्य प्रदेश के उज्जैन में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कही, जहां उन्होंने भारत की प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा और समय गणना की विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि समय निर्धारण की जड़ें भारत से जुड़ी रही हैं।

दरअसल, GMT वह वैश्विक समय मानक है, जो लंदन के ग्रीनविच से गुजरने वाली “प्राइम मेरिडियन” (शून्य देशांतर रेखा) पर आधारित है। 1884 में अंतरराष्ट्रीय सहमति के बाद इसे दुनिया का आधिकारिक समय मान लिया गया था, और तब से लेकर आज तक पूरी दुनिया में समय का निर्धारण इसी के आधार पर होता है।

लेकिन Dharmendra Pradhan का तर्क है कि समय गणना की मूल अवधारणा भारत की देन है और उज्जैन प्राचीन काल में खगोलशास्त्र और समय निर्धारण का प्रमुख केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि “महाकाल स्टैंडर्ड टाइम” के जरिए भारत अपनी वैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित कर सकता है। उनका यह भी मानना है कि वर्तमान समय प्रणाली औपनिवेशिक दौर की देन है, जिसे अब बदलने पर विचार होना चाहिए।

इतिहास की बात करें तो 1884 से पहले दुनिया के कई देश अपने-अपने स्थानीय समय का इस्तेमाल करते थे। भारत में भी लंबे समय तक उज्जैन को समय गणना का केंद्र माना जाता था और हिंदू पंचांग व ज्योतिषीय गणनाएं आज भी इसी परंपरा से प्रभावित हैं। हालांकि, ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में 1906 में “इंडियन स्टैंडर्ड टाइम (IST)” लागू किया गया, जो उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पास से गुजरने वाली रेखा पर आधारित है।

हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि GMT को बदलना इतना आसान नहीं है। इसके लिए दुनिया के अधिकांश देशों की सहमति, वैज्ञानिक संस्थाओं का समर्थन और तकनीकी ढांचे में बड़े बदलाव की जरूरत होगी। अगर अचानक ऐसा किया जाता है, तो वैश्विक स्तर पर व्यापार, नेविगेशन, एयर ट्रैफिक और डिजिटल सिस्टम में भारी अव्यवस्था पैदा हो सकती है।

फिलहाल, “महाकाल स्टैंडर्ड टाइम” का प्रस्ताव एक विचार के रूप में सामने आया है, जिसने भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत बनाम आधुनिक वैश्विक व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विचार केवल चर्चा तक सीमित रहता है या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे गंभीरता से लिया जाता है।

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