
महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन के भीतर विभिन्न निगमों और सरकारी संस्थाओं के बंटवारे को लेकर लंबे समय से चल रही चर्चा के बीच एक अहम सहमति बनने की खबर है। BJP, शिवसेना और NCP के बीच निगमों के आवंटन का आधार तीनों दलों की विधानसभा में ताकत को बनाया गया है। यानी जिस पार्टी के पास जितने अधिक विधायक हैं, उसे उसी अनुपात में अधिक निगमों की जिम्मेदारी मिलने की संभावना है। यह फॉर्मूला गठबंधन के भीतर सत्ता और संस्थागत हिस्सेदारी को लेकर चल रही खींचतान को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
महाराष्ट्र विधानसभा के 2024 चुनाव में BJP 132 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। वहीं एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 57 और NCP ने 41 सीटें जीती थीं। इन आंकड़ों के आधार पर ही महायुति के भीतर निगमों के बंटवारे का फॉर्मूला तैयार किया गया है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा BJP को मिलना तय माना जा रहा है, क्योंकि विधानसभा में उसकी संख्या सहयोगी दलों से काफी ज्यादा है। इसके बाद शिवसेना और NCP को उनकी विधायकों की संख्या के अनुपात में हिस्सेदारी मिलेगी। इस तरह सरकार में शामिल तीनों प्रमुख दलों के बीच निगमों के वितरण को लेकर एक स्पष्ट आधार तय करने की कोशिश की गई है, ताकि भविष्य में किसी विभाग या संस्था को लेकर विवाद की स्थिति कम हो।
महायुति सरकार में BJP, शिवसेना और NCP तीनों दल सत्ता के महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस BJP से हैं, जबकि शिवसेना और NCP के पास भी सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। ऐसे में सरकारी निगमों और बोर्डों में नियुक्तियां राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इन संस्थाओं के जरिए सरकार की विभिन्न योजनाओं और क्षेत्रों से जुड़े प्रशासनिक कामकाज को आगे बढ़ाया जाता है।
निगमों के बंटवारे को लेकर सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब केवल राजनीतिक प्रभाव या व्यक्तिगत दावों के बजाय विधानसभा में दलों की वास्तविक संख्या को आधार बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे सहयोगी दलों के बीच हिस्सेदारी तय करने में अपेक्षाकृत स्पष्ट व्यवस्था बन सकती है। हालांकि, किस पार्टी को कौन-सा निगम मिलेगा और किन नेताओं को इन संस्थाओं में पद दिए जाएंगे, इसका अंतिम विवरण अलग-अलग स्तर पर सामने आना बाकी है।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र की राजनीति में महायुति के भीतर सत्ता संतुलन को लेकर लगातार चर्चा होती रही है। हाल के दिनों में NCP के भीतर भी नेतृत्व और महत्वपूर्ण मंत्रालयों को लेकर आंतरिक खींचतान की खबरें सामने आई हैं। सहयोगी दलों के बीच हिस्सेदारी का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रत्येक पार्टी अपने राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्रों और कार्यकर्ताओं को प्रतिनिधित्व दिलाना चाहती है।
स्थानीय निकाय चुनावों के बाद भी महायुति के भीतर राजनीतिक समीकरणों पर काफी ध्यान दिया जा रहा है। 2026 के महाराष्ट्र स्थानीय निकाय चुनावों में गठबंधन के तीनों दलों ने अलग-अलग क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया, जबकि BJP का प्रदर्शन विशेष रूप से मजबूत रहा। ऐसे में निगमों के बंटवारे में विधानसभा की संख्या को आधार बनाना BJP की मजबूत स्थिति को संस्थागत हिस्सेदारी में भी प्रतिबिंबित करता है।
महाराष्ट्र में सरकारी निगमों और बोर्डों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इन संस्थाओं में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य पदों पर राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं। इन नियुक्तियों के जरिए सत्ताधारी दल अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर सकते हैं। इसलिए महायुति के भीतर निगमों का यह बंटवारा आने वाले समय में संगठनात्मक और चुनावी राजनीति पर भी असर डाल सकता है।
फिलहाल महायुति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तीनों प्रमुख सहयोगियों के बीच निगमों की हिस्सेदारी तय करने के लिए एक फॉर्मूला सामने आया है। BJP की बड़ी विधानसभा ताकत के कारण उसे सबसे अधिक हिस्सेदारी मिलने की संभावना है, जबकि शिवसेना और NCP को क्रमशः अपनी सीटों के आधार पर हिस्सा मिलेगा। यदि इस समझौते को बिना किसी बड़े विवाद के लागू किया जाता है, तो इससे गठबंधन के भीतर लंबे समय से चल रही संस्थागत नियुक्तियों की प्रक्रिया को गति मिल सकती है।



