
भारत की परंपरा है भाईचारा — झगड़ा-विवाद करना हमारा स्वभाव नहीं
हाल ही में नागपुर में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की परंपरा सदियों से “भाईचारे और सामूहिक सद्भाव” (fraternity and social harmony) की रही है — न कि झगड़ा-विवाद और वैमनस्यता की। उन्होंने जोर देकर कहा कि “झगड़ा करना हमारे देश का स्वभाव नहीं है”, और भारतवासियों की असली पहचान “आपसी सम्मान, सहअस्तित्व और विविधता के साथ एकता” में निहित है।
भागवत ने यह बात दुनिया के उन हिस्सों के अनुभवों के संदर्भ में कही, जहाँ — उनका मानना है — एक राय या विचार को मान्यता मिलने के बाद बाकी विचारों को खारिज कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे समाजों में जब शक्ति या एकमत हो जाती है, तो वे “दूसरे विचारों के लिए दरवाज़ा बंद कर देते हैं” और इसे ‘…इज्म’ बताना शुरू कर देते हैं। इसके विपरीत, भारत में सदियों से यह सहभिन्ना रवैया रहा है कि भिन्न-भिन्न विचार, विश्वास और संस्कृतियाँ एक साथ मिलजुल कर रहती आई हैं।
भागवत ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि भारत का राष्ट्रवाद पश्चिमी मॉडलों से हटकर है। जहाँ कई देशों में राष्ट्र-निर्माण अक्सर सीमाओं, भेदभाव और असहिष्णुता पर आधारित रहा है, वहीं भारत की पहचान उसकी सभ्यता, संस्कृति, सहअस्तित्व और विविधता में निहित है। इसीलिए, भारत में “राष्ट्रीयता” का मतलब सिर्फ राजनीतिक या क्षेत्रीय राष्ट्रवाद नहीं — बल्कि एक साझा सांस्कृतिक और सामाजिक समझ है।
उनका यह संदेश उस व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में आया है, जहाँ धर्म, भाषा, संस्कृति या जात-पांठ के आधार पर मतभेदों और बहसों की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। मोहन भागवत का यह बयान उन मतभेदों और कट्टरवाद के स्वरूपों के खिलाफ एक प्रकार की आत्म-पहचान और एकजुटता की अपील है।
समाज के लिए उनका यह संदेश है कि विवादों, असहिष्णुता और सामूहिक विरोध से बचा जाए; बजाय इसके, एक दूसरे को समझने, स्वीकारने और साथ रहने की भावना को बढ़ावा दिया जाए। उनका यह सुझाव है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में निहित एकता है — और यही उसके सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का मूल आधार है।



