
संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के संख्याबल को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों और कुछ विपक्षी दलों के भीतर हुए बदलावों के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन लोकसभा में उस विशेष बहुमत के काफी करीब पहुंचता दिखाई दे रहा है, जिसकी आवश्यकता संविधान संशोधन से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए होती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि एनडीए को कुछ और सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो वह भविष्य में परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण से जुड़े लंबित विधेयकों को आगे बढ़ाने की बेहतर स्थिति में आ सकता है।
दरअसल, संविधान संशोधन से जुड़े किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की आवश्यकता होती है। इसी विशेष बहुमत की कमी के कारण इस वर्ष लोकसभा में महिला आरक्षण को शीघ्र लागू करने के उद्देश्य से लाया गया संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पारित नहीं हो सका था। इसके साथ ही परिसीमन विधेयक भी आगे नहीं बढ़ पाया था। अब बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच एक बार फिर इन विधेयकों के भविष्य को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
हाल के दिनों में कुछ विपक्षी दलों के सांसदों के रुख में बदलाव और राजनीतिक पुनर्संरेखण की अटकलों ने एनडीए के लिए संभावनाएं बढ़ा दी हैं। रिपोर्टों के अनुसार, यदि सरकार को कुछ अतिरिक्त सांसदों का समर्थन मिल जाता है, तो वह विशेष बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकती है। हालांकि सरकार के पास अभी भी आवश्यक संख्या पूरी तरह सुनिश्चित नहीं मानी जा रही है और अंतिम स्थिति संसद में मतदान के समय ही स्पष्ट होगी।
परिसीमन विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्यों की विधानसभा सीटों का नए सिरे से पुनर्निर्धारण करना है ताकि जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित बनाया जा सके। वहीं महिला आरक्षण से संबंधित प्रावधानों को लागू करने के लिए भी परिसीमन प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाती है। सरकार पहले यह स्पष्ट कर चुकी है कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए आवश्यक संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पूरा करना जरूरी है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल इन प्रस्तावों को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दलों ने परिसीमन को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यदि सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। वहीं सरकार का कहना है कि सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही कोई भी अंतिम निर्णय लिया जाएगा और किसी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा।
इसी बीच कुछ क्षेत्रीय दलों का रुख भी चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की नेता सुप्रिया सुले ने संकेत दिया है कि यदि परिसीमन के दौरान सभी राज्यों के लिए समान सिद्धांत अपनाया जाता है, तो उनकी पार्टी इस प्रस्ताव पर सकारात्मक विचार कर सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि पार्टी ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है और किसी भी समर्थन को कुछ शर्तों से जोड़ा जाएगा। ऐसे संकेतों ने संसद के आगामी सत्र से पहले राजनीतिक समीकरणों को और रोचक बना दिया है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एनडीए भविष्य में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में सफल रहता है, तो वह संविधान संशोधन से जुड़े कई महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाने की स्थिति में आ सकता है। हालांकि इसके लिए केवल संख्याबल ही नहीं, बल्कि सहयोगी दलों और संभावित समर्थन देने वाले विपक्षी सांसदों के बीच व्यापक सहमति भी आवश्यक होगी। ऐसे में संसद का आगामी मानसून सत्र केवल विधायी कार्यवाही के लिहाज से ही नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक दिशा तय करने के दृष्टिकोण से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



