
पोलैंड में संवैधानिक संकट! बीच रास्ते से विदेश दौरा छोड़ लौटे राष्ट्रपति
यूरोपीय देश पोलैंड में सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव ने गंभीर राजनीतिक संकट का रूप ले लिया है। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि राष्ट्रपति करोल नावरोकी को अपना विदेश दौरा बीच रास्ते में ही छोड़कर वापस देश लौटना पड़ा। वह सेनेगल की यात्रा पर जा रहे थे, लेकिन देश की संवैधानिक अदालत में मचे विवाद और पुलिस की तैनाती की खबरों के बाद उन्होंने अपना विमान वापस मोड़ने का फैसला किया। राष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे समय में उनका पोलैंड में मौजूद रहना जरूरी है।
यह पूरा विवाद पोलैंड की संवैधानिक अदालत यानी कॉन्स्टिट्यूशनल ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष बोगदान स्विएंत्कोव्स्की को उनके पद से निलंबित किए जाने के बाद शुरू हुआ। शुक्रवार को न्यायाधीश अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने अदालत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष बार्तोमिए सोखांस्की को उनके कामकाज से निलंबित करने की घोषणा की। उनका आरोप था कि अदालत का मौजूदा नेतृत्व संसद के वर्तमान बहुमत द्वारा चुने गए न्यायाधीशों को काम करने से रोक रहा है। हालांकि, अदालत के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट ने इस कार्रवाई को अवैध बताते हुए इसे तख्तापलट की कोशिश करार दिया।
विवाद बढ़ने के बाद राजधानी वारसॉ में संवैधानिक अदालत के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। विपक्षी पार्टी लॉ एंड जस्टिस (PiS) के समर्थक और कई प्रदर्शनकारी अदालत के बाहर जुट गए। कुछ प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बैरिकेड पार करने की कोशिश की और पुलिसकर्मियों पर वस्तुएं फेंकीं। पुलिस के मुताबिक, इस दौरान तीन लोगों को हिरासत में लिया गया। हालात को देखते हुए दंगा नियंत्रण पुलिस को भी तैनात करना पड़ा।
राष्ट्रपति करोल नावरोकी ने सोशल मीडिया पर अपने फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि वह सेनेगल जा रहे विमान को वापस बुला रहे हैं। वारसॉ पहुंचने के बाद उन्होंने संवैधानिक अदालत के घटनाक्रम पर नाराजगी जताई और इसे देश की संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन बताया। रिपोर्टों के मुताबिक, राष्ट्रपति देर रात अदालत परिसर पहुंचे और वहां मौजूद न्यायिक अधिकारियों के साथ बातचीत की। उन्होंने सुरक्षा बलों से अदालत परिसर छोड़ने की मांग भी की।
इस राजनीतिक टकराव के केंद्र में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार और विपक्षी PiS पार्टी के बीच लंबे समय से जारी विवाद है। टस्क की सरकार का कहना है कि पिछली सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका का राजनीतिकरण किया गया था और अब अदालतों को स्वतंत्र तरीके से काम करने लायक बनाना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि कानून का शासन बहाल करना सरकार की जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, PiS नेताओं का आरोप है कि मौजूदा सरकार संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है।
पोलैंड में यह विवाद नया नहीं है। इसकी जड़ें साल 2015 तक जाती हैं, जब PiS पार्टी की सरकार ने संवैधानिक अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर कई फैसले किए थे। बाद में सत्ता परिवर्तन के बाद नई संसद ने भी न्यायाधीशों की नियुक्तियां कीं, लेकिन राष्ट्रपति और अदालत के पुराने नेतृत्व के बीच इन नियुक्तियों को लेकर विवाद बना रहा। मौजूदा राष्ट्रपति ने संसद के वर्तमान बहुमत की ओर से चुने गए कुछ न्यायाधीशों को शपथ दिलाने से इनकार कर दिया था। इससे अदालत के कामकाज और उसकी वैधता पर सवाल खड़े होते रहे हैं।
विवाद में न्याय मंत्रालय की भूमिका भी अहम हो गई है। न्याय मंत्री और अटॉर्नी जनरल वाल्डेमार जुरेक ने अदालत के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कानूनी प्रतिरक्षा हटाने की मांग की है, ताकि उनके खिलाफ संभावित आपराधिक कार्रवाई की जा सके। सरकार का आरोप है कि अदालत के मौजूदा नेतृत्व ने न्यायाधीशों के कामकाज में बाधा डाली है। वहीं, विपक्ष और अदालत से जुड़े कुछ लोगों ने इस कदम की वैधता पर सवाल उठाए हैं। विशेषज्ञों के बीच भी इस निलंबन के कानूनी आधार को लेकर मतभेद हैं।
इस घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई गई है। अमेरिका के पोलैंड में राजदूत टॉम रोज ने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि दोनों पक्ष घटनाओं की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। उन्होंने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की। वहीं, यूरोप की कानूनी संस्थाओं के बीच भी पोलैंड की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक अदालत की स्थिति को लेकर पहले से चिंता रही है।
फिलहाल पोलैंड में संवैधानिक अदालत के नियंत्रण और न्यायाधीशों की वैधता को लेकर टकराव जारी है। राष्ट्रपति की अचानक वापसी ने इस विवाद को और सुर्खियों में ला दिया है। एक तरफ सरकार इसे न्यायिक व्यवस्था बहाल करने की प्रक्रिया बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कह रहा है। आने वाले दिनों में अदालत और सरकार के बीच यह विवाद किस दिशा में जाता है, इस पर पूरे यूरोप की नजर बनी हुई है।



