
सुप्रीम कोर्ट परिसर में हुई अभूतपूर्व घटना के बाद दिल्ली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के दो कानून छात्रों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए छात्रों में प्रभल प्रताप सिंह और चंदर भान शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, दोनों पर आरोप है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान अनुशासन भंग किया, अदालत की कार्यवाही में बाधा डाली और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत को लेकर कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इस घटना के बाद न्यायपालिका की गरिमा और अदालत की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
रिपोर्टों के मुताबिक, यह पूरा घटनाक्रम उस समय हुआ जब दोनों छात्र एक मामले में स्वयं पक्षकार (Petitioner-in-Person) के रूप में अदालत में मौजूद थे। सुनवाई के दौरान प्रभल प्रताप सिंह ने कथित तौर पर अदालत के समक्ष असामान्य व्यवहार किया, न्यायाधीशों से तीखी बहस की और बाद में अदालत कक्ष में दस्तावेज हवा में उछाल दिए। इसके बाद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें कोर्टरूम से बाहर ले जाकर स्थिति को नियंत्रित किया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरीं।
घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा शाखा की शिकायत पर दिल्ली के तिलक मार्ग थाने में मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच शुरू करते हुए दोनों आरोपियों को हिरासत में लिया और उनसे पूछताछ की। अधिकारियों के अनुसार, दोनों का चिकित्सकीय परीक्षण भी कराया गया, जिसमें उन्हें मानसिक रूप से स्वस्थ पाया गया। जांच के दौरान उनके पास से कुछ ऐसे दस्तावेज और पर्चे भी मिलने की बात कही गई है, जिनकी जांच की जा रही है। पुलिस अब यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि यह कृत्य पूर्व नियोजित था या फिर अदालत की कार्यवाही के दौरान अचानक हुई प्रतिक्रिया थी।
इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने घटना पर नाराजगी व्यक्त की थी। हालांकि तत्काल अवमानना की कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी और अदालत ने उस समय संयम बरतने का फैसला लिया था। बाद में सुरक्षा एजेंसियों की शिकायत और पुलिस जांच के आधार पर कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई गई। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत की कार्यवाही में व्यवधान डालना और न्यायपालिका की गरिमा को प्रभावित करने वाला व्यवहार गंभीर मामला माना जाता है तथा ऐसे मामलों में कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इस घटनाक्रम ने न्यायालयों में सुरक्षा व्यवस्था, अदालत की मर्यादा और न्यायिक संस्थाओं के प्रति सम्मान जैसे मुद्दों को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत में अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन यह अधिकार न्यायालय की गरिमा और निर्धारित प्रक्रिया के दायरे में ही प्रयोग किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि मामले की जांच सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर निष्पक्ष तरीके से की जा रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल दोनों आरोपियों को अदालत में पेश कर आगे की न्यायिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इस मामले पर कानूनी समुदाय और आम लोगों की नजर बनी हुई है, क्योंकि यह घटना देश की सर्वोच्च अदालत की कार्यवाही के दौरान हुई है। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और अदालत की आगे की सुनवाई के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि इस प्रकरण में आगे कौन-कौन से कानूनी कदम उठाए जाते हैं।



