
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को फिलहाल स्थिर रखने के फैसले और अमेरिका-ईरान शांति समझौते के बाद वैश्विक बाजारों में मिले-जुले संकेतों के बीच भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को शुरुआती कारोबार में दुविधा की स्थिति में दिखाई दिया। एक ओर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर फेड की ओर से भविष्य में ब्याज दर बढ़ाने के संकेतों ने बाजार की तेजी पर ब्रेक लगाने का काम किया। इसी वजह से कारोबार की शुरुआत में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही सीमित दायरे में उतार-चढ़ाव करते नजर आए।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशक फिलहाल दो बड़े वैश्विक घटनाक्रमों का प्रभाव समझने की कोशिश कर रहे हैं। पहला, अमेरिकी केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों को यथावत रखना और दूसरा, अमेरिका तथा ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते से मध्य पूर्व में तनाव कम होने की उम्मीद। इस समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है, जिससे भारत जैसे तेल आयातक देशों को राहत मिलने की संभावना बढ़ गई है।
हालांकि फेड की बैठक के बाद निवेशकों की चिंता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। फेड अधिकारियों ने संकेत दिया है कि महंगाई पर नियंत्रण उनकी प्राथमिकता बनी हुई है और जरूरत पड़ने पर आने वाले महीनों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसी आशंका का असर अमेरिकी बाजारों पर भी दिखाई दिया, जहां प्रमुख सूचकांक दबाव में रहे। इसका असर भारतीय आईटी शेयरों पर पड़ा क्योंकि इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार से आता है। उच्च ब्याज दरें अमेरिकी कंपनियों के खर्च और निवेश को प्रभावित कर सकती हैं, जिसका असर भारतीय आईटी उद्योग पर भी पड़ सकता है।
दूसरी तरफ अमेरिका-ईरान समझौते से वैश्विक निवेशकों को राहत मिली है। समझौते के तहत दोनों देशों ने तनाव कम करने और व्यापारिक गतिविधियों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। इससे तेल आपूर्ति को लेकर बनी चिंताएं कम हुई हैं और बाजार को उम्मीद है कि आने वाले समय में ऊर्जा लागत पर दबाव घट सकता है। तेल कीमतों में नरमी से भारत की महंगाई और चालू खाते के घाटे पर सकारात्मक असर पड़ने की संभावना है, जो शेयर बाजार के लिए दीर्घकालिक रूप से अनुकूल माना जा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार निकट भविष्य में भारतीय बाजार की दिशा काफी हद तक वैश्विक संकेतों, कच्चे तेल की चाल और अमेरिकी मौद्रिक नीति से जुड़े संकेतों पर निर्भर करेगी। यदि तेल कीमतें नियंत्रित रहती हैं और भू-राजनीतिक तनाव और कम होता है तो घरेलू बाजार को समर्थन मिल सकता है। हालांकि विदेशी निवेशकों की रणनीति और फेड के अगले कदमों पर नजर बनाए रखना निवेशकों के लिए जरूरी होगा। फिलहाल बाजार में सतर्कता का माहौल है और निवेशक बड़े दांव लगाने से पहले नई आर्थिक जानकारियों का इंतजार कर रहे हैं।



