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ईरान युद्ध के बीच पीएम मोदी की ‘गोल्ड और पेट्रोल बचाओ

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मिडिल ईस्ट में जारी ईरान युद्ध और होर्मुज संकट के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi की हालिया अपील ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है। पीएम मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, जरूरत पड़ने पर वर्क फ्रॉम होम अपनाने, विदेशी यात्राएं टालने और यहां तक कि एक साल तक गैरजरूरी सोना न खरीदने की अपील की है। प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल रहा है और भारत की विदेशी मुद्रा स्थिति पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। खास तौर पर कच्चे तेल और सोने के आयात पर देश को हर साल अरबों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। ईरान युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बढ़ने से तेल सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और ऐसे में हर बढ़ती कीमत का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि यह समय संयम और जिम्मेदारी दिखाने का है। उन्होंने लोगों से सार्वजनिक परिवहन का अधिक इस्तेमाल करने, कार पूलिंग अपनाने और जहां संभव हो वहां वर्क फ्रॉम होम मॉडल को बढ़ावा देने की अपील की। उनका मानना है कि इससे पेट्रोल और डीजल की खपत कम होगी और भारत को विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी। केंद्रीय मंत्री Nitin Gadkari ने भी पीएम की अपील का समर्थन करते हुए लोगों से ईंधन बचाने की दिशा में कदम उठाने को कहा है।

सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री की “गोल्ड अपील” को लेकर हो रही है। पीएम मोदी ने कहा कि अगर लोग एक साल तक गैरजरूरी सोने की खरीदारी टाल दें तो देश का काफी विदेशी मुद्रा भंडार बचाया जा सकता है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीदने वाले देशों में शामिल है और हर साल भारी मात्रा में गोल्ड इम्पोर्ट किया जाता है। यही वजह है कि युद्ध और तेल संकट के समय सोने का आयात सरकार के लिए चिंता का विषय बन गया है। पीएम की इस अपील के बाद ज्वेलरी कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली। बाजार में आशंका बढ़ी कि सरकार भविष्य में गोल्ड इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ा सकती है, हालांकि सरकार ने फिलहाल ऐसी किसी योजना से इनकार किया है।

दरअसल, ईरान युद्ध के चलते वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी अस्थिरता पैदा हो गई है। कई रिपोर्ट्स के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार का रास्ता गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि का सीधा असर पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर पड़ता है। भारत के लिए स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि देश की बड़ी आबादी और उद्योग अब भी आयातित ईंधन पर निर्भर हैं।

पीएम मोदी ने सिर्फ तेल और सोने की बात नहीं की, बल्कि खाने के तेल और रासायनिक उर्वरकों की खपत कम करने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर हर परिवार खाद्य तेल का उपयोग थोड़ा कम करे तो इससे देश का विदेशी मुद्रा खर्च कम होगा और लोगों की सेहत भी सुधरेगी। साथ ही उन्होंने प्राकृतिक खेती और सोलर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

आर्थिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री की यह अपील केवल बचत का संदेश नहीं बल्कि आने वाले संभावित आर्थिक संकट की चेतावनी भी है। बढ़ते तेल दाम, कमजोर होता रुपया और विदेशी निवेश में गिरावट भारत के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में आशंका जताई गई है कि यदि मिडिल ईस्ट संकट लंबा चला तो भारत का व्यापार घाटा और महंगाई दोनों तेजी से बढ़ सकते हैं।

हालांकि केंद्र सरकार लगातार यह भरोसा दिला रही है कि देश में फिलहाल पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और घबराने की जरूरत नहीं है। इसके बावजूद सरकार एहतियात के तौर पर लोगों से ऊर्जा बचत और जिम्मेदार खर्च करने की अपील कर रही है। पीएम मोदी ने इसे “देशभक्ति का नया रूप” बताते हुए कहा कि छोटे-छोटे कदम मिलकर भारत को बड़े आर्थिक संकट से बचा सकते हैं।

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