
बांग्लादेश में 12 फरवरी को हुए 2026 के संसद चुनाव के परिणामों ने देश की राजनीतिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। चुनावी मतगणना के शुरुआती संकेतों के मुताबिक Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने बड़ी बहुमत हासिल करते हुए जीत का दावा किया है और राष्ट्र की नई सरकार बनाने की दिशा में अग्रसर है — यह जीत पार्टी की 20 साल से भी अधिक की सत्ता से बाहर होने के बाद एक बड़ा राजनीतिक बदलाव मानी जा रही है।
BNP के तालिक रज़मान के नेतृत्व में हुए इस चुनाव में पार्टी को अकेले ही लगभग 212 से 209 से अधिक सीटें मिलने की रिपोर्ट है, जिससे वह संसदीय बहुमत के करीब पहुंच गई है और सरकार बनाने की स्थिति में है। यह जीत देश के राजनीतिक इतिहास में विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह चुनाव अब तक की सबसे मुक्त और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें युवाओं और विविध सामाजिक समूहों ने भाग लिया।
वहीं Jamaat‑e‑Islami ने भी इस चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और संसदीय प्रतिनिधित्व हासिल किया है। पार्टी और उसके सहयोगियों ने लगभग 68 से 70 सीटें जीती हैं, जो पिछली प्रस्तुतियों की तुलना में बड़ी छलांग है। हालांकि जमात पूर्ण बहुमत नहीं बना पाई, लेकिन वह मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर सकती है और उसे संसद में प्रभावी भूमिका मिलने की संभावना है। जमात के प्रमुख शफीकुर रहमान ने कहा है कि पार्टी “रोक-टोक वाली राजनीति” से अलग सकारात्मक राजनीति करना चाहेगी।
इस चुनाव में National Citizen Party जैसे नए दल ने भी पहली बार संसदीय सीटें हासिल कीं, हालांकि उसकी संख्या कम है। यह पार्टी 2024 में शुरू हुई युवा-नेतृत्व वाली लड़ाई से उभरकर आई थी और इसने कुछ सीटों पर सफल प्रदर्शन किया है, जो बांग्लादेश की राजनीति में युवाओं की बढ़ती भागीदारी का संकेत है।
चुनाव की पृष्ठभूमि में यह भी ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी पार्टी Awami League को इस बार चुनाव आयोग द्वारा पंजीकरण निरस्त कर दिया गया था, जिससे चुनाव का परिदृश्य काफी बदल गया। हसीना के नेतृत्व वाली पार्टी का लंबे समय तक शासन रहा है और उनकी अनुपस्थिति ने BNP और जमात को भारी अवसर दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार चुनाव के मुद्दों में लोकतंत्र को बहाल करना, भ्रष्टाचार-रोधी नीतियाँ, अर्थव्यवस्था में सुधार और शासन की पारदर्शिता शामिल रहे, और इन मुद्दों ने मतदाताओं को BNP के पक्ष में प्रेरित किया। BNP ने चुनाव प्रचार में गरीब-परिवारों के लिए आर्थिक मदद, प्रधानमंत्री के कार्यकाल को सीमित करना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना और भ्रष्टाचार को कम करना जैसे वादे केंद्र में रखे।
वहीं जमात-e-Islामी ने धार्मिक-आधारित सामाजिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार उन्मूलन और आर्थिक विविधीकरण जैसे मुद्दों को भी अपने एजेंडा में रखा। इस बार उन्होंने पहली बार हिंदू समुदाय के लिए उम्मीदवार भी उतारे, ताकि अल्पसंख्यक मतदाताओं में अपनी पैठ बढ़ा सकें।



