Advertisement
भारतलाइव अपडेट
Trending

डॉलर की बादशाहत को चुनौती देगा BRICS?

Advertisement
Advertisement

अमेरिकी डॉलर की वैश्विक बादशाहत को लेकर BRICS देशों की रणनीति इस समय पूरी दुनिया का ध्यान खींच रही है। भारत की मेजबानी में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वां BRICS शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। इस बैठक में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था को आसान बनाने और अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता कम करने जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। हालांकि, भारत की मौजूदा प्राथमिकता किसी नई BRICS करेंसी को लॉन्च करने के बजाय अलग-अलग देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने पर है।

BRICS अब पहले के मुकाबले काफी बड़ा आर्थिक समूह बन चुका है। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी शामिल हैं। समूह वैश्विक आबादी के करीब 45% हिस्से और वैश्विक GDP के 30% से अधिक का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में अगर सदस्य देश आपसी व्यापार में डॉलर की जगह अपनी-अपनी मुद्राओं का इस्तेमाल बढ़ाते हैं, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था पर पड़ सकता है।

दरअसल, स्थानीय मुद्रा में व्यापार का विचार नया नहीं है। रूस और चीन के बीच पिछले कुछ वर्षों में युआन और रूबल में कारोबार तेजी से बढ़ा है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद दोनों देशों ने डॉलर आधारित भुगतान पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ाया। इसी तरह भारत ने भी कई देशों के साथ रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए विशेष रुपया वोस्ट्रो खाते की व्यवस्था की है।

भारत और रूस का उदाहरण इस पूरी व्यवस्था की चुनौती को भी समझाता है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, जबकि रूस को भारत से होने वाला निर्यात उसी अनुपात में नहीं है। ऐसे में रुपये में भुगतान होने पर रूस के पास बड़ी मात्रा में भारतीय मुद्रा जमा हो जाती है। समस्या यह है कि रुपये को दुनिया की हर जगह आसानी से खर्च या निवेश नहीं किया जा सकता। इसी वजह से भारत-रूस व्यापार में रुपये के साथ रूबल, यूएई दिरहम और अन्य माध्यमों का इस्तेमाल भी देखने को मिला है।

फिर भी स्थानीय मुद्राओं में कारोबार का दायरा लगातार बढ़ रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक BRICS के आपसी व्यापार में करीब 65% तक कारोबार स्थानीय मुद्राओं के जरिए होने का दावा किया गया है। रूस और चीन के बीच तो डॉलर के बजाय युआन और रूबल में व्यापार का हिस्सा 95% से अधिक बताया गया है। भारत और रूस के बीच भी पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद कच्चे तेल और कमोडिटी कारोबार का बड़ा हिस्सा गैर-डॉलर माध्यमों से हुआ है। हालांकि, इन आंकड़ों को पूरे वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता।

सबसे बड़ी चुनौती यही है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने के बावजूद दुनिया के कुल व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका अभी भी बेहद मजबूत है। डॉलर की स्वीकार्यता, अमेरिकी वित्तीय बाजारों की गहराई और अंतरराष्ट्रीय भुगतान व्यवस्था में उसकी केंद्रीय भूमिका के कारण BRICS देशों के लिए अचानक डॉलर को हटाना आसान नहीं है। इसलिए मौजूदा कोशिश को डॉलर को रातोंरात खत्म करने के बजाय व्यापार के लिए दूसरे विकल्प तैयार करने की प्रक्रिया के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

भारत का रुख इस मामले में चीन और रूस से कुछ अलग दिखाई देता है। भारत डॉलर पर निर्भरता के जोखिम को कम करने और व्यापार के लिए विकल्प बढ़ाने के पक्ष में है, लेकिन किसी एक नई मुद्रा को डॉलर का सीधा विकल्प बनाने को लेकर सावधानी बरतता है। इसी वजह से सीमा-पार डिजिटल भुगतान व्यवस्था और राष्ट्रीय मुद्राओं में लेनदेन को ज्यादा व्यावहारिक रास्ता माना जा रहा है। एक सरकारी अधिकारी के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक भारत BRICS में ऐसी भुगतान व्यवस्था पर जोर दे रहा है, जिसमें सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं का इस्तेमाल कर सकें।

इसका मतलब यह भी है कि फिलहाल BRICS की दिशा किसी साझा मुद्रा की तरफ तेजी से बढ़ने की नहीं है। नई दिल्ली में होने वाले सम्मेलन से पहले सामने आई जानकारी के मुताबिक भारत ने स्पष्ट किया है कि BRICS करेंसी या सीधे तौर पर डी-डॉलराइजेशन उसका प्राथमिक एजेंडा नहीं है। भारत का जोर ज्यादा व्यावहारिक व्यवस्था पर है, जिसमें अलग-अलग देशों के बीच भुगतान तेज, सस्ता और कम डॉलर-निर्भर बनाया जा सके।

अगर BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को बड़े पैमाने पर अपनाते हैं, तो इसका असर अमेरिका पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। डॉलर की वैश्विक मांग कम होने पर अमेरिकी मुद्रा की अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों और डॉलर आधारित भुगतान व्यवस्था का प्रभाव भी कुछ हद तक सीमित हो सकता है। हालांकि, यह बदलाव धीरे-धीरे होगा और इसके लिए मजबूत बैंकिंग नेटवर्क, भरोसेमंद भुगतान प्रणाली और ऐसी मुद्राओं की जरूरत होगी जिन्हें दूसरे देश आसानी से स्वीकार कर सकें।

चीन के लिए यह प्रक्रिया खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह युआन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन की पूंजी व्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण और युआन की सीमित अंतरराष्ट्रीय परिवर्तनीयता जैसी चुनौतियां इसे डॉलर का तत्काल विकल्प बनने से रोकती हैं। दूसरी ओर, भारत भी रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बढ़ावा दे रहा है, लेकिन रुपये को वैश्विक रिजर्व मुद्रा बनाने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।

दिलचस्प बात यह है कि रूस भी हाल में यह संकेत दे चुका है कि वह किसी एक तरह के डी-डॉलराइजेशन अभियान के बजाय भुगतान के अलग-अलग स्वीकार्य तरीकों के लिए खुला है। इससे साफ है कि BRICS के सभी सदस्य देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। समूह के भीतर डॉलर पर निर्भरता कम करने की इच्छा जरूर है, लेकिन उसके तरीके और गति को लेकर मतभेद भी मौजूद हैं।

ऐसे में BRICS की असली चुनौती डॉलर को एक झटके में हटाना नहीं, बल्कि ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था बनाना है जो भरोसेमंद, सस्ती और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने लायक हो। यदि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, डिजिटल भुगतान और वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क मजबूत होते हैं, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में डॉलर का एकाधिकार धीरे-धीरे कमजोर हो सकता है। लेकिन फिलहाल डॉलर की जगह किसी एक नई मुद्रा के स्थापित होने की संभावना दूर दिखाई देती है।

भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। एक तरफ उसे रूस, चीन और दूसरे BRICS देशों के साथ व्यापार बढ़ाना है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके आर्थिक संबंध भी बेहद अहम हैं। इसलिए भारत का रास्ता किसी एक मुद्रा या किसी एक शक्ति के पक्ष में जाने के बजाय ऐसी बहु-विकल्पीय वैश्विक भुगतान व्यवस्था तैयार करने का दिखाई देता है, जिसमें व्यापार के लिए डॉलर के साथ-साथ रुपये और दूसरी राष्ट्रीय मुद्राओं का भी इस्तेमाल किया जा सके।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
YouTube
LinkedIn
Share