
दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: रेस कोर्स मस्जिद में नमाज की इजाजत देने के लिए सरकार को मजबूर नहीं कर सकता कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित रेस कोर्स मस्जिद में नमाज अदा करने के लिए श्रद्धालुओं को प्रवेश देने के मामले में कहा है कि मौजूदा सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए अदालत सरकार को इसकी अनुमति देने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इलाके में अन्य निर्माणों को हटाने की कार्रवाई जारी होने और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण मस्जिद तक पहुंच प्रतिबंधित है। अदालत में यह मामला मस्जिद में प्रवेश की अनुमति और उसके संरक्षण की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया।
रेस कोर्स मस्जिद दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के नजदीक रेस कोर्स क्लब परिसर में स्थित है। यह परिसर लगभग 53 एकड़ में फैला हुआ है। मस्जिद को याचिका में 1977 से वक्फ संपत्ति और ग्रेड-2 विरासत संरचना बताया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि धार्मिक स्थल तक पहुंच रोकने और उसके भविष्य को लेकर बनी आशंका पर अधिकारियों को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।
यह याचिका मस्जिद में नमाज अदा करने वाले सैयद अहमद सऊद ने दायर की है। उन्होंने अदालत से श्रद्धालुओं को मस्जिद में प्रवेश की अनुमति देने और ढांचे को संभावित तोड़फोड़ से सुरक्षा प्रदान करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मस्जिद तक पहुंच रोके जाने से धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर असर पड़ रहा है।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि फिलहाल मस्जिद को गिराने की कोई तत्काल योजना नहीं है। सरकार ने यह भी कहा कि दिल्ली वक्फ बोर्ड की ओर से दिए गए प्रतिवेदन पर फैसला होने तक मस्जिद के खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया।
सरकार के मुताबिक, आसपास के इलाके में अन्य संरचनाओं को हटाने की कार्रवाई के दौरान लोगों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए मस्जिद तक पहुंच और बिजली-पानी की सुविधाओं पर रोक लगाई गई थी। अधिकारियों की चिंता यह है कि जारी कार्रवाई के बीच परिसर में लोगों की आवाजाही से सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकता है। इसी आधार पर मस्जिद में प्रवेश की अनुमति देने के अनुरोध पर भी सवाल उठे।
मस्जिद के संरक्षण को लेकर दिल्ली वक्फ बोर्ड ने संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपना पक्ष रखा है। अदालत को बताया गया कि बोर्ड का प्रतिवेदन 19 अक्टूबर को भूमि एवं विकास कार्यालय सहित संबंधित विभागों को दिया गया था। अब अधिकारियों को इस पर विचार कर निर्णय लेना है। केंद्र की ओर से कहा गया है कि इस प्रक्रिया को चार सप्ताह के भीतर पूरा किया जाएगा।
इस विवाद की पृष्ठभूमि में इलाके की जमीन पर सरकारी नियंत्रण और आसपास की बस्तियों को हटाने की कार्रवाई भी शामिल है। अधिकारियों ने पहले सुरक्षा और संबंधित भूमि पर कब्जा वापस लेने की प्रक्रिया का हवाला दिया था। वहीं, याचिकाकर्ता का पक्ष है कि मस्जिद को आसपास की कार्रवाई से अलग देखते हुए उसके धार्मिक और विरासत संबंधी दर्जे पर विचार किया जाना चाहिए।
फिलहाल, मस्जिद को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित अधिकारियों के निर्णय और आगे की न्यायिक सुनवाई पर निर्भर करेगी। अदालत में अगली सुनवाई 16 दिसंबर को निर्धारित की गई है। तब तक केंद्र सरकार की ओर से दिए गए आश्वासन के अनुसार मस्जिद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी, जबकि श्रद्धालुओं को प्रवेश देने का मुद्दा सुरक्षा परिस्थितियों और मामले में उठाए गए कानूनी पक्षों के बीच विचाराधीन बना हुआ है।



