
भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता यानी CEPA (Comprehensive Economic Partnership Agreement) 1 जून 2026 से आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। इस समझौते को भारत की व्यापारिक और रणनीतिक नीति के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील केवल व्यापार बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि मिडिल ईस्ट में भारत की आर्थिक मौजूदगी को और मजबूत करेगी। इसी वजह से इसे भारत और ओमान दोनों के लिए “गेम चेंजर” करार दिया जा रहा है।
यह मोदी सरकार के कार्यकाल में लागू होने वाला पांचवां बड़ा मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है। इससे पहले भारत मॉरीशस, ऑस्ट्रेलिया, यूएई और EFTA देशों के साथ ऐसे समझौते लागू कर चुका है। भारत ने ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ भी इसी तरह के समझौते किए हैं, जबकि यूरोपीय संघ के साथ भी बातचीत आगे बढ़ रही है। ऐसे में ओमान के साथ CEPA को भारत की “एक्ट वेस्ट” रणनीति और वैश्विक व्यापार विस्तार की दिशा में अहम उपलब्धि माना जा रहा है।
इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ओमान ने भारत को अपनी 98.08 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी-फ्री मार्केट एक्सेस दिया है। इसका मतलब है कि भारतीय उत्पाद अब ओमान के बाजार में बिना या बेहद कम शुल्क के पहुंच सकेंगे। इससे भारत के लगभग 99.38 प्रतिशत निर्यात मूल्य को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। इंजीनियरिंग सामान, फार्मा, कृषि उत्पाद, प्रोसेस्ड फूड, टेक्सटाइल, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्लास्टिक, जेम्स एंड ज्वेलरी और समुद्री उत्पादों के निर्यात में तेज बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए भी यह समझौता बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शहद, काजू, बेकरी उत्पाद, डेयरी आइटम, फ्रोजन फिश और कई खाद्य उत्पादों को ओमान के बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी। इससे भारतीय किसानों, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और निर्यातकों को नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं। खास बात यह है कि कई उत्पादों पर पहले 5 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगता था, जिसे अब हटाया जा रहा है।
फार्मास्यूटिकल और हेल्थकेयर सेक्टर को भी इस समझौते से बड़ा फायदा मिलने वाला है। भारत में बनी दवाओं और वैक्सीन को ओमान में आसान और तेज मंजूरी मिलने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा अमेरिका, यूरोप और ब्रिटेन की नियामक संस्थाओं से स्वीकृत दवाओं की मार्केटिंग प्रक्रिया को भी तेज करने पर सहमति बनी है। इससे भारतीय दवा कंपनियों के लिए खाड़ी देशों में कारोबार बढ़ाने का रास्ता और आसान होगा।
केवल वस्तुओं का व्यापार ही नहीं, बल्कि सेवाओं के क्षेत्र में भी यह समझौता नई संभावनाएं लेकर आया है। भारतीय प्रोफेशनल्स, आईटी विशेषज्ञों, डॉक्टरों, आर्किटेक्ट्स, टैक्स कंसल्टेंट्स और अन्य कुशल कर्मचारियों को ओमान में काम करने के अधिक अवसर मिल सकते हैं। समझौते में पेशेवरों के लिए आसान प्रवेश, अस्थायी निवास और सेवाओं के विस्तार से जुड़ी कई व्यवस्थाएं शामिल की गई हैं। साथ ही ओमान ने कुछ प्रमुख सेवा क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों के लिए 100 प्रतिशत विदेशी निवेश (FDI) की सुविधा भी दी है।
इस डील का एक रणनीतिक पहलू भी है। ओमान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला के लिहाज से महत्वपूर्ण साझेदार माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ओमान के बंदरगाह भारत को खाड़ी क्षेत्र, अफ्रीका और यूरोप तक पहुंच बनाने में मदद कर सकते हैं। इससे भारत की व्यापारिक निर्भरता कुछ पारंपरिक मार्गों पर कम हो सकती है और नए व्यापारिक कॉरिडोर विकसित हो सकते हैं।
हालांकि भारत ने इस समझौते में अपने संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा है। लगभग 2,789 टैरिफ लाइनों को एक्सक्लूजन लिस्ट में रखा गया है। इनमें परिवहन उपकरण, कुछ केमिकल्स, अनाज, फल-सब्जियां, मसाले, चाय-कॉफी, रबर, लेदर, टेक्सटाइल और अन्य घरेलू उद्योग शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी प्रतिस्पर्धा के कारण भारतीय उद्योगों और किसानों को नुकसान न पहुंचे।
ओमान को भी इस समझौते से कई लाभ मिलने वाले हैं। खजूर, पेट्रोकेमिकल उत्पाद, फ्रैंकिंसेंस, गम अरेबिका और मार्बल जैसे उत्पादों को भारतीय बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी। इससे दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन मजबूत होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-ओमान CEPA आने वाले वर्षों में दोनों देशों के व्यापार को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार 11 अरब डॉलर से अधिक रहा है और इस समझौते के बाद इसमें उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। यही कारण है कि इस डील को केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।



