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ईरान कैसे भेद रहा है अमेरिका की मिसाइल रक्षा प्रणाली?

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मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान की मिसाइल क्षमता एक बार फिर वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गई है। हाल के हमलों के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर ईरान किस तरह अमेरिका और इजरायल की अत्याधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों को चुनौती देने में सफल हो रहा है। रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान द्वारा विकसित नई पीढ़ी की हाइपरसोनिक और अत्यधिक गतिशील मिसाइलें हैं, जो उड़ान के दौरान दिशा बदलने में सक्षम हैं। ऐसी मिसाइलों को पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों की तुलना में ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना कहीं अधिक कठिन होता है। वहीं, विभिन्न रिपोर्टों में यह भी दावा किया जा रहा है कि रूस और चीन से मिलने वाली तकनीकी एवं खुफिया सहायता ने ईरान की सैन्य क्षमता को पहले की तुलना में अधिक प्रभावी बना दिया है।

विशेषज्ञों के अनुसार ईरान की फतह-1 और फतह-2 जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें ध्वनि की गति से कई गुना अधिक रफ्तार से उड़ान भर सकती हैं और अंतिम चरण में अचानक दिशा बदलने की क्षमता रखती हैं। यही कारण है कि अमेरिका की THAAD, पैट्रियट और इजरायल की आयरन डोम जैसी रक्षा प्रणालियों के लिए इन्हें रोकना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। ईरान का दावा है कि उसकी नई मिसाइल तकनीक आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाने में सक्षम है। हालांकि स्वतंत्र विशेषज्ञ इन दावों की पुष्टि को लेकर सतर्क रहने की सलाह देते हैं और मानते हैं कि वास्तविक क्षमता का आकलन युद्धक्षेत्र के विस्तृत विश्लेषण के बाद ही संभव है।

रिपोर्टों के मुताबिक रूस ईरान को सैटेलाइट इमेजरी, खुफिया जानकारी और ड्रोन तकनीक उपलब्ध कराने में सहयोग कर रहा है। इससे ईरानी सेना को संभावित लक्ष्यों की पहचान करने और अधिक सटीक तरीके से हमलों की योजना बनाने में मदद मिलती है। यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस और ईरान के बीच बढ़े रक्षा सहयोग को भी इस रणनीतिक साझेदारी का महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि दोनों देशों के बीच तकनीकी आदान-प्रदान से मिसाइलों की सटीकता और लक्ष्य भेदन क्षमता में सुधार हुआ है, जिससे अमेरिकी और इजरायली सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है।

चीन की भूमिका को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। अमेरिकी अधिकारियों को संदेह है कि चीन ने ईरान को उन्नत टारगेटिंग तकनीक, नेविगेशन सिस्टम और कुछ डुअल-यूज तकनीकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष सहायता प्रदान की है। हालांकि बीजिंग ने प्रत्यक्ष सैन्य सहयोग के आरोपों से इनकार किया है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि चीन और ईरान के बीच वर्षों से चले आ रहे तकनीकी और आर्थिक संबंधों ने ईरान की रक्षा परियोजनाओं को मजबूत आधार दिया है। अमेरिकी एजेंसियां इस सहयोग पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण चुनौती मान रही हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान की हाइपरसोनिक और अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक लगातार प्रभावी साबित होती रही तो इससे वैश्विक मिसाइल रक्षा रणनीतियों में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी देश अब ऐसी नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं जो भविष्य में हाइपरसोनिक हथियारों का मुकाबला कर सकें। दूसरी ओर, मध्य पूर्व में बढ़ता सैन्य तनाव यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में मिसाइल तकनीक और रक्षा प्रणालियों के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। हालिया घटनाओं में अमेरिकी ठिकानों पर हुए हमलों और उसके बाद अमेरिका की सैन्य प्रतिक्रिया ने इस पूरे क्षेत्र को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

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