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होर्मुज संकट के बीच UN में टकराव

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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकाबंदी के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा का मंच एक बड़े कूटनीतिक टकराव का गवाह बना। इजरायल के राजदूत ने खुलकर चीन, फ्रांस और पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि इन देशों ने ईरान के साथ गुप्त समझौते किए हैं ताकि उनके जहाजों को सुरक्षित रास्ता मिल सके। उन्होंने सवाल उठाया कि जब दुनिया भर के जहाजों को रोका जा रहा है, तब कुछ देशों के जहाज आसानी से कैसे गुजर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने फ्रांस से सीधे पूछा कि क्या उन्होंने ईरान को पैसे देकर रास्ता खरीदा है और यहां तक कि “चेक दिखाने” की चुनौती भी दी।

राजदूत ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान ने खुद किसी तरह के समझौते की बात स्वीकार की है, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया जा रहा। वहीं चीन पर भी आरोप लगाए गए कि उसके जहाजों को विशेष छूट मिल रही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी हो रही है। इन आरोपों पर संबंधित देशों की चुप्पी ने विवाद को और गहरा कर दिया है। इजरायल का कहना है कि इस तरह के गुप्त समझौते ईरान को मजबूत कर रहे हैं और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।

यह पूरा विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है और कई विदेशी जहाजों को वापस लौटने के लिए कहा गया है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अहम मार्ग है और यहां किसी भी तरह की बाधा का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। हाल के घटनाक्रमों में यह भी देखा गया है कि इस क्षेत्र में सैन्य और कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों के बीच तनाव और बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह आरोप-प्रत्यारोप सिर्फ कूटनीतिक बयानबाजी नहीं बल्कि बड़े भू-राजनीतिक खेल का हिस्सा हैं। चीन और पाकिस्तान जहां एक ओर शांति वार्ता और मध्यस्थता की बात कर रहे हैं, वहीं इजरायल इनकी भूमिका पर सवाल उठा रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका और उसके सहयोगी देश होर्मुज को खुला रखने के लिए दबाव बना रहे हैं।

कुल मिलाकर, होर्मुज संकट अब सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कानून की परीक्षा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र इस विवाद को सुलझाने में कोई ठोस भूमिका निभा पाता है या फिर यह टकराव और गहराता है।

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