
यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिकी राजनीति में एक नया और दिलचस्प खुलासा सामने आया है। एक नई किताब में दावा किया गया है कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने यूक्रेन में शांति स्थापना और संघर्ष विराम की निगरानी के लिए भारतीय सैनिकों को तैनात करने का सुझाव दिया था। हालांकि, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस प्रस्ताव को सुनकर हंसते हुए प्रतिक्रिया दी और इसे गंभीरता से नहीं लिया। किताब में किए गए इस दावे ने अमेरिका, भारत और यूक्रेन से जुड़ी कूटनीतिक चर्चाओं को फिर से सुर्खियों में ला दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन और रूस के बीच लंबे समय से चल रहे युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिकी नीति-निर्माताओं के बीच कई तरह के विकल्पों पर चर्चा हो रही थी। इसी दौरान जेडी वेंस ने कथित तौर पर यह विचार रखा कि यदि युद्धविराम होता है तो उसकी निगरानी के लिए ऐसे देशों की सेना को लगाया जा सकता है जो सीधे संघर्ष का हिस्सा नहीं हैं और जिनकी वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता है। इस संदर्भ में भारत का नाम सामने आया। वेंस का मानना था कि भारत की अंतरराष्ट्रीय साख और दोनों पक्षों के साथ संतुलित संबंध उसे संभावित शांति मिशन के लिए उपयुक्त बना सकते हैं।
किताब में यह भी उल्लेख किया गया है कि ट्रंप ने इस सुझाव पर हल्के अंदाज में प्रतिक्रिया दी और इसे व्यावहारिक नहीं माना। बताया गया है कि बैठक के दौरान इस प्रस्ताव पर ज्यादा चर्चा आगे नहीं बढ़ी। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह सुझाव औपचारिक नीति प्रस्ताव के रूप में रखा गया था या फिर विचार-विमर्श के दौरान सामने आए कई विकल्पों में से एक था। इसके बावजूद इस खुलासे ने अमेरिकी सत्ता गलियारों में हुई बंद कमरे की चर्चाओं की झलक जरूर पेश की है।
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित कूटनीति पर आधारित रही है। रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत ने किसी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है। नई दिल्ली लगातार यह कहती रही है कि युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए ही संभव है। ऐसे में यदि कभी भारत को किसी अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन में शामिल करने का विचार सामने आया भी हो, तो उसके राजनीतिक, सैन्य और कूटनीतिक पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श आवश्यक होता।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत संयुक्त राष्ट्र के कई शांति मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है और भारतीय सैनिकों की पेशेवर क्षमता को दुनिया भर में सम्मान की नजर से देखा जाता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों पर चर्चा के दौरान भारत का नाम अक्सर विश्वसनीय साझेदार के रूप में सामने आता है। हालांकि यूक्रेन जैसा संवेदनशील और भू-राजनीतिक रूप से जटिल संघर्ष किसी भी देश के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है।
इस खुलासे के सामने आने के बाद राजनीतिक विश्लेषक यह भी चर्चा कर रहे हैं कि अमेरिका के भीतर यूक्रेन युद्ध को लेकर अलग-अलग सोच मौजूद रही है। कुछ नेता युद्ध में प्रत्यक्ष भागीदारी कम करने और वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं पर जोर देते रहे हैं, जबकि अन्य समूह पश्चिमी देशों की भूमिका को और मजबूत बनाने के पक्षधर रहे हैं। जेडी वेंस का कथित सुझाव भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा माना जा रहा है।
हालांकि भारत, अमेरिका या यूक्रेन की ओर से इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन किताब में किए गए इस खुलासे ने यह जरूर दिखाया है कि यूक्रेन युद्ध के समाधान को लेकर वैश्विक स्तर पर कितने विविध और असामान्य विकल्पों पर विचार किया जाता रहा है। आने वाले समय में यदि इस विषय पर और दस्तावेज या विवरण सामने आते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और सुरक्षा नीति से जुड़े कई नए पहलुओं पर भी रोशनी पड़ सकती है।



