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चायपत्ती और बिस्कुट घर ले जाने पर गई 17 साल की नौकरी

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झारखंड में एक सरकारी कर्मचारी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सेवा से बर्खास्त किए गए कर्मचारी की बहाली का आदेश दिया है। मामला बोकारो जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) में संविदा पर कार्यरत एक कर्मचारी से जुड़ा है, जिस पर कार्यालय से चायपत्ती और कुछ बिस्कुट घर ले जाने का आरोप लगाया गया था। इस आरोप के बाद कर्मचारी की लगभग 17 वर्षों की नौकरी समाप्त कर दी गई थी, लेकिन अब झारखंड हाईकोर्ट ने इस कार्रवाई को असंगत और अत्यधिक कठोर मानते हुए उसे निरस्त कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, कर्मचारी रंजीत कुमार हिमांशु कई वर्षों से डीआरडीए बोकारो में चपरासी के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2022 में उन पर कार्यालय में बची हुई चायपत्ती और कुछ बिस्कुट घर ले जाने का आरोप लगा। इसके बाद उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, लेकिन नोटिस में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि आखिर कितनी सामग्री गायब हुई थी और उससे सरकारी व्यवस्था को कितना नुकसान पहुंचा। कर्मचारी ने बाद में संबंधित सामग्री वापस भी कर दी थी, इसके बावजूद उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

कर्मचारी ने अपनी बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान उनके पक्ष की ओर से दलील दी गई कि जिस कथित गलती को आधार बनाकर सेवा समाप्त की गई, वह इतनी गंभीर नहीं थी कि उसके लिए 17 वर्षों की नौकरी छीन ली जाए। अदालत को यह भी बताया गया कि कर्मचारी के खिलाफ कोई बड़ा वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार का मामला नहीं था और विवादित सामग्री को वापस भी कर दिया गया था।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में आरोप और सजा के बीच संतुलन होना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि मामूली स्तर के आरोपों के लिए सबसे कठोर दंड देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि कर्मचारी को जारी किए गए नोटिस में आरोपों का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया था, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूरी तरह पालन नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में डीआरडीए बोकारो को कर्मचारी को दोबारा सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने बकाया वेतन का 50 प्रतिशत भुगतान करने का भी आदेश दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन वह परिस्थितियों और कथित गलती की गंभीरता के अनुरूप होनी चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल एक कर्मचारी को राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक निर्णयों में संवेदनशीलता, निष्पक्षता और अनुपातिक दंड के सिद्धांत को भी मजबूत करता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में ऐसे मामलों में यह निर्णय एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है, जहां अदालतों ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि छोटी त्रुटियों के लिए अत्यधिक कठोर सजा देना उचित नहीं है।

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