
नेपाल बाढ़ की खौफनाक कहानी: चीनी सुपरवाइजर ने सुरंग से बाहर निकलने नहीं दिया
नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में फंसे मजदूरों की कहानियां अब इस त्रासदी की भयावह तस्वीर सामने ला रही हैं। त्रिशूली क्षेत्र में बाढ़ और मलबे के बीच फंसे एक जीवित बचे मजदूर ने दावा किया है कि चीनी सुपरवाइजर ने शुरुआत में कर्मचारियों को सुरंग से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद अचानक आई बाढ़ और मलबे ने सुरंग के रास्तों को घेर लिया और कई मजदूरों की जिंदगी खतरे में पड़ गई।
नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के बाद कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा है। सुरंगों में बड़ी मात्रा में पानी, कीचड़ और मलबा भर जाने के कारण सैकड़ों मजदूरों के फंसे होने की आशंका है। बचाव दल लगातार इन सुरंगों में पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन टूटी सड़कें, भारी मलबा और अस्थिर ढांचे राहत अभियान को बेहद मुश्किल बना रहे हैं।
जीवित बचे मजदूर के अनुसार, जब हालात बिगड़ने लगे तो कर्मचारियों के बीच बाहर निकलने की बेचैनी बढ़ गई थी। लेकिन कथित तौर पर चीनी सुपरवाइजर की ओर से उन्हें सुरंग से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद हालात तेजी से बदल गए और बाढ़ का पानी तथा मलबा सुरंग के भीतर घुसने लगा। उस समय मजदूरों के सामने अपनी जान बचाने के लिए बेहद कम समय बचा था।
किसी तरह बाहर निकलने में सफल मजदूर की कहानी इस बात की ओर इशारा करती है कि सुरंगों के अंदर मौजूद कर्मचारियों को अचानक आई आपदा के दौरान बेहद कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। सुरंगों के रास्ते मलबे से बंद हो गए और कई जगहों पर पानी और कीचड़ भर गया। अब बचाव दल इन्हीं बंद रास्तों को खोलकर अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
इस आपदा में हाइड्रोपावर परियोजनाएं सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल हैं। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 900 हाइड्रोपावर कर्मचारी संपर्क से बाहर हैं और उनमें से लगभग 500 के सुरंगों के अंदर फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। कई परियोजनाओं की सुरंगों में मलबा भर गया है, जिससे अंदर मौजूद लोगों तक पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण हो गया है।
बचाव अभियान में भारत और नेपाल की टीमें भी मिलकर काम कर रही हैं। भारतीय सेना की तकनीकी टीमें मुश्किल परिस्थितियों में सुरंगों तक पहुंचने और उनके अंदर सुरक्षित रास्ता बनाने में मदद कर रही हैं। चिलिमे और लांगटांग जैसे इलाकों में बचाव दल सुरंगों के भीतर आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन अस्थिर ढांचे और मलबे के कारण हर कदम बेहद जोखिम भरा है।
त्रिशूली क्षेत्र में स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि बाढ़ ने केवल लोगों को ही नहीं, बल्कि सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कई दूरदराज के इलाकों तक पहुंचने के रास्ते टूट गए हैं। ऐसे में राहत सामग्री पहुंचाना और सुरंगों में फंसे लोगों तक बचाव दल भेजना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नेपाल की इस आपदा में मरने वालों की संख्या 1,000 से ऊपर पहुंच चुकी है और हजारों लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं। 2 सितंबर तक विभिन्न रिपोर्टों में करीब 4,000 या उससे अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। बचाव एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब उन लोगों को ढूंढना है जो हाइड्रोपावर सुरंगों, मलबे और दुर्गम इलाकों में फंसे हो सकते हैं।
सुरंगों में फंसे लोगों के लिए समय सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है। अंदर पानी, साफ हवा और भोजन की कमी हो सकती है, जबकि लगातार मलबा गिरने से सुरंगों की संरचना और अस्थिर हो रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में बचाव अभियान बेहद कठिन होता है और हर सुरंग की स्थिति अलग होने के कारण बचाव दलों को सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा है।
इस बीच, जीवित बचे मजदूर की कहानी ने इस सवाल को भी सामने ला दिया है कि आपदा के शुरुआती संकेत मिलने पर सुरंगों में काम कर रहे कर्मचारियों की निकासी को लेकर क्या व्यवस्था थी। चीनी सुपरवाइजर द्वारा कथित तौर पर मजदूरों को बाहर नहीं निकलने देने के दावे की आधिकारिक जांच के बाद ही इसकी पूरी सच्चाई सामने आएगी। फिलहाल यह दावा जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
नेपाल की इस त्रासदी ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहे हाइड्रोपावर निर्माण, आपदा प्रबंधन और श्रमिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ नेपाल में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में परियोजनाएं बन रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अचानक आने वाली बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं का खतरा लगातार बना हुआ है।
फिलहाल राहत और बचाव अभियान जारी है। सुरंगों में फंसे मजदूरों को बाहर निकालना प्राथमिकता बनी हुई है। हर गुजरते घंटे के साथ उम्मीदें कमजोर जरूर हो रही हैं, लेकिन बचाव दल अब भी मलबे के बीच जिंदगी की तलाश में जुटे हैं। इस आपदा में सुरक्षित बाहर निकलने वाले मजदूर की कहानी उन सैकड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण है, जिनके अपने अभी भी लापता हैं।



