
विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) की बैठक में भारत ने चीन समर्थित निवेश समझौते को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई है। दरअसल, “इंवेस्टमेंट फैसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट (IFD)” नामक इस समझौते को WTO के ढांचे में शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसका भारत ने खुलकर विरोध किया। भारत का कहना है कि इस तरह के समझौते संगठन के मूल सिद्धांतों और बहुपक्षीय (multilateral) व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं।
यह मुद्दा इन दिनों कैमरून में चल रही WTO की 14वीं मंत्रीस्तरीय बैठक के दौरान सामने आया, जहां भारत ने साफ कहा कि IFD समझौते को “एनेक्स-4” के तहत शामिल करना संगठन की संरचना और संतुलन के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी इस पर स्पष्ट बयान देते हुए कहा कि भारत ऐसे किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगा, जो WTO की मूल भावना को कमजोर करता हो।
दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर भारत लगभग अकेला पड़ता नजर आ रहा है, क्योंकि 100 से ज्यादा देश इस समझौते के पक्ष में खड़े हैं। कई देशों का मानना है कि IFD समझौता निवेश को आसान बनाएगा, नियमों को सरल करेगा और वैश्विक व्यापार को बढ़ावा देगा। लेकिन भारत का तर्क है कि यह “प्लूरिलेटरल” (कुछ देशों के बीच समझौता) व्यवस्था को बढ़ावा देता है, जो WTO की सर्वसम्मति (consensus) आधारित प्रणाली के खिलाफ है।
भारत की चिंता केवल संरचनात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक भी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समझौता विकासशील देशों की नीति-निर्माण क्षमता (policy space) को सीमित कर सकता है और खाद्य सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों को पीछे धकेल सकता है। भारत लंबे समय से सार्वजनिक भंडारण (public stockholding) और कृषि सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने की मांग करता रहा है।
इसके अलावा, भारत का मानना है कि WTO में किसी भी नए समझौते को शामिल करने से पहले व्यापक सहमति और स्पष्ट नियम (guardrails) तय किए जाने चाहिए। भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह WTO सुधार (reform) के लिए तैयार है, लेकिन किसी भी एकतरफा या सीमित समूह के समझौते को वैश्विक नियम बनाने के खिलाफ है।
वैश्विक स्तर पर इस विवाद का असर भी साफ दिखाई दे रहा है। कई देशों ने अलग से डिजिटल व्यापार और निवेश से जुड़े समझौते आगे बढ़ाने शुरू कर दिए हैं, जिससे WTO की एकजुटता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
कुल मिलाकर, WTO में चीन समर्थित निवेश समझौते को लेकर भारत का विरोध केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा बड़ा संकेत है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या भारत अपने रुख पर कायम रहता है या अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच कोई नया रास्ता निकलता है।



