
दुनिया की आबादी को लेकर एक ऐसा बदलाव सामने आया है, जो आने वाले दशकों में कई देशों की अर्थव्यवस्था, रोजगार, पेंशन व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को बदल सकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के आधार पर 2026 तक 64 देश और क्षेत्र ऐसे हो चुके हैं, जहां आबादी अपने उच्चतम स्तर यानी Peak Population को पार कर चुकी है। अब इन जगहों पर जनसंख्या बढ़ने के बजाय धीरे-धीरे कम होने का दौर शुरू हो गया है। इनमें यूरोप और पूर्वी एशिया के कई देश शामिल हैं।
इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण जन्मदर में लगातार गिरावट है। कई देशों में परिवार छोटे हो रहे हैं और लोगों के जीवन में शादी तथा बच्चे पैदा करने की उम्र भी पहले की तुलना में बदल रही है। दूसरी तरफ चिकित्सा सुविधाओं और जीवन प्रत्याशा में सुधार के कारण लोग ज्यादा लंबे समय तक जीवित रह रहे हैं। नतीजा यह है कि बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, जबकि बच्चों और युवा आबादी का अनुपात घटता जा रहा है। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में पहली बार 65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 5 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों से ज्यादा हो गई है।
चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में शामिल चीन अब जनसंख्या घटने के दौर में पहुंच चुका है। लंबे समय तक लागू रही एक-बच्चा नीति, कम होती जन्मदर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी ने चीन के जनसांख्यिकीय ढांचे को बदल दिया है। इसी तरह जापान, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी आबादी घटने और उम्रदराज होने की चुनौती गंभीर होती जा रही है। मौजूदा अनुमानों के अनुसार दक्षिण कोरिया और चीन की आबादी इस सदी के अंत तक मौजूदा स्तर की तुलना में आधे से भी कम हो सकती है, जबकि इटली की आबादी में भी 40% से अधिक की गिरावट संभव है।
जनसंख्या में गिरावट का मतलब सिर्फ लोगों की संख्या कम होना नहीं है। इसका सीधा असर किसी देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब काम करने वाली उम्र की आबादी घटती है तो कंपनियों को कर्मचारियों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। उद्योगों में श्रमिकों की उपलब्धता कम हो सकती है और सरकारों के सामने टैक्स से होने वाली आय तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती पेंशन और बुजुर्गों की देखभाल को लेकर सामने आ सकती है। अगर किसी देश में काम करने वाले युवाओं की संख्या कम और पेंशन पाने वाले बुजुर्गों की संख्या ज्यादा हो जाए तो सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं, वृद्ध देखभाल और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बढ़ सकता है। यही वजह है कि कई विकसित देश अपनी जनसंख्या संरचना में आ रहे बदलाव को भविष्य की बड़ी आर्थिक चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
इसका असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है। बड़ी आबादी वाले देशों के पास आम तौर पर बड़ा श्रमबल, बड़ा घरेलू बाजार और ज्यादा उपभोक्ता होते हैं। लेकिन अगर आबादी लगातार घटने लगे तो आने वाले दशकों में कुछ देशों का घरेलू बाजार छोटा हो सकता है। उत्पादन, निवेश और सैन्य क्षमता पर भी इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी तरफ जिन देशों में युवा आबादी तेजी से बढ़ रही है, उनका वैश्विक आर्थिक महत्व बढ़ सकता है।
भारत इस बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य में अलग स्थिति में खड़ा दिखाई देता है। भारत की आबादी अभी भी दुनिया में सबसे बड़ी है और देश के पास बड़ी कामकाजी आबादी है। लेकिन भारत भी जन्मदर में गिरावट के दौर से गुजर रहा है। इसका अर्थ है कि आज भारत के पास जो विशाल युवा कार्यबल है, उसे आने वाले दशकों में उत्पादक रोजगार, शिक्षा और कौशल से जोड़ना बेहद महत्वपूर्ण होगा।
भारत के लिए यह स्थिति एक अवसर भी है और चुनौती भी। यदि देश अपनी युवा आबादी को अच्छी शिक्षा, कौशल, रोजगार और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करा पाता है तो यह जनसांख्यिकीय लाभांश आर्थिक विकास को तेज कर सकता है। लेकिन अगर पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा हुए तो यही बड़ी युवा आबादी बेरोजगारी और सामाजिक दबाव का कारण भी बन सकती है।
दुनिया में जनसंख्या का यह बदलाव क्षेत्रीय स्तर पर भी काफी असमान है। यूरोप और पूर्वी एशिया के कई हिस्से पहले ही आबादी घटने के दौर में पहुंच चुके हैं, जबकि अफ्रीका के कई देशों में आबादी तेजी से बढ़ रही है। यानी एक तरफ दुनिया के कुछ हिस्से ‘कम लोगों’ की समस्या से जूझेंगे, वहीं दूसरी तरफ कुछ देशों को तेजी से बढ़ती आबादी के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, भोजन और बुनियादी ढांचे की व्यवस्था करनी होगी।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक वैश्विक आबादी अभी तुरंत घटने वाली नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने 2024 के अपने अनुमान में दुनिया की आबादी के इस सदी के मध्य बाद बढ़ते-बढ़ते लगभग 10.3 अरब के आसपास पहुंचने और फिर सदी के उत्तरार्ध में स्थिर होकर धीरे-धीरे घटने की संभावना जताई है। यानी दुनिया के लिए भविष्य की तस्वीर एक साथ दो अलग-अलग चुनौतियां लेकर आ रही है—कहीं आबादी बहुत तेजी से बढ़ेगी तो कहीं लगातार घटेगी।
दिलचस्प बात यह है कि आबादी घटने को केवल संकट के रूप में देखना भी पूरी तरह सही नहीं होगा। कम आबादी का मतलब कुछ देशों में संसाधनों पर दबाव कम होना, प्रति व्यक्ति संसाधनों की उपलब्धता बढ़ना और पर्यावरण पर कुछ दबाव कम होना भी हो सकता है। लेकिन इसके साथ आर्थिक गतिविधियों को बनाए रखने, बुजुर्गों की देखभाल करने और पर्याप्त कार्यबल उपलब्ध कराने की चुनौती भी बढ़ेगी।
यही वजह है कि दुनिया के 64 देशों में आबादी के Peak से आगे निकलने की खबर को सिर्फ जनसंख्या का आंकड़ा नहीं माना जा सकता। यह आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था, रोजगार, प्रवासन, पेंशन, स्वास्थ्य व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा बदलाव है। दुनिया धीरे-धीरे उस दौर की ओर बढ़ रही है जहां कुछ देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता ‘बहुत ज्यादा लोग’ नहीं, बल्कि ‘काम करने वाले लोग कम पड़ जाना’ हो सकती है।



