
दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को 6 दिन में खाली करने का नोटिस
दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को लेकर विवाद बढ़ गया है। केंद्र सरकार के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने 19 अक्टूबर 2026 को मस्जिद परिसर को छह दिन के भीतर खाली करने का नोटिस जारी किया। इस कार्रवाई के बाद मस्जिद की स्थिति और जमीन के कानूनी अधिकारों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
AIMIM के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉ. शोएब जामेई ने नोटिस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका दावा है कि रेस कोर्स रोड पर स्थित यह मस्जिद करीब 125 साल पुरानी है और 1977 के दिल्ली गजट में दर्ज है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मस्जिद से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं, तो उसे परिसर खाली करने का नोटिस क्यों दिया गया। जामेई ने इस कार्रवाई को मस्जिद को हटाने की साजिश बताते हुए विरोध करने की बात कही।
जामेई ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो में कहा कि मस्जिद से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार इसका संबंध वक्फ संपत्ति से है। उन्होंने आरोप लगाया कि एक अधिकारी ने मस्जिद को एक सप्ताह के भीतर हटाने की चेतावनी दी। हालांकि, मस्जिद की जमीन और उसके कानूनी दर्जे को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और कानूनी प्रक्रिया से स्पष्ट होगी।
उन्होंने ‘सेव मस्जिद, सेव दिल्ली’ अभियान के तहत लोगों से साथ आने की अपील भी की। जामेई ने आम आदमी पार्टी के नेताओं और वक्फ बोर्ड से जुड़े लोगों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मस्जिद के संरक्षण के लिए पहले पर्याप्त कानूनी कदम क्यों नहीं उठाए गए। ये आरोप उनके बयान का हिस्सा हैं; संबंधित पक्षों का जवाब अलग से सामने आना बाकी है।
इस मामले में AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से हस्तक्षेप करने की मांग की है। ओवैसी ने सवाल उठाया कि मस्जिद को 1977 से गजट में दर्ज वक्फ संपत्ति बताया जा रहा है, इसके बावजूद संबंधित वक्फ प्राधिकरण ने नोटिस को चुनौती देने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए।
मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हारून ने भी आरोप लगाया है कि परिसर की बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई है तथा नमाजियों की आवाजाही प्रभावित हुई है। उनके मुताबिक, उन्हें परिसर खाली करने के लिए छह दिन का समय दिया गया है। इन दावों के बीच जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से मुलाकात कर मस्जिद और उससे सटे कब्रिस्तान की सुरक्षा तथा मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी।
विवाद का एक अहम पहलू मस्जिद की जमीन का दर्जा है। मस्जिद पक्ष इसकी वक्फ संपत्ति के रूप में मान्यता और ऐतिहासिक महत्व का हवाला दे रहा है। वहीं, यह नोटिस इलाके में सरकारी जमीन खाली कराने की व्यापक कार्रवाई के बीच जारी किया गया है। इस पूरे मामले में कानूनी स्थिति, सरकारी रिकॉर्ड और संबंधित प्राधिकरणों के कदम अहम होंगे।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने नोटिस के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट जाने की बात कही है। ऐसे में अब इस मामले का अगला चरण कानूनी कार्रवाई और मस्जिद की जमीन से जुड़े दस्तावेजों की जांच पर निर्भर करेगा। फिलहाल, मस्जिद को लेकर राजनीतिक और धार्मिक संगठनों की आपत्तियों के बीच विवाद जारी है।



