
राजस्थान में नगर निकाय चुनाव से पहले टिकट वितरण को लेकर कांग्रेस के भीतर घमासान तेज हो गया है। उम्मीदवारों के चयन को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं में नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है। जोधपुर से लेकर बीकानेर तक टिकट को लेकर विवाद ने कांग्रेस की चुनावी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहीं टिकट को लेकर कार्यकर्ता आमने-सामने हैं तो कहीं पार्टी के ही नेताओं पर मनमाने तरीके से उम्मीदवार चुनने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
बीकानेर में विवाद उस समय और गंभीर हो गया जब टिकट वितरण को लेकर नाराज कार्यकर्ताओं के बीच तनाव बढ़ गया और कांग्रेस के जिला अध्यक्ष के साथ मारपीट की घटना सामने आई। कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कुछ वार्डों में एक से अधिक उम्मीदवारों को पार्टी का चुनाव चिन्ह दिए जाने जैसी स्थिति पैदा हुई। इसे लेकर पार्टी के अंदर ‘सिंबल चोरी’ जैसे आरोप और राजनीतिक तंज भी सामने आए। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि टिकट वितरण की प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं बरती गई और कुछ नेताओं की पसंद को प्राथमिकता दी गई।
बीकानेर के इस विवाद के केंद्र में पार्टी के शहर प्रभारी और पूर्व आईपीएस अधिकारी मदन गोपाल मेघवाल का नाम भी सामने आया है। नाराज कार्यकर्ताओं ने उन पर टिकट वितरण में मनमानी करने के आरोप लगाए हैं। हालांकि आरोपों और विवाद के बीच पार्टी के भीतर वास्तविक स्थिति क्या है, इसका अंतिम फैसला आधिकारिक जांच और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा। फिलहाल इस घटनाक्रम ने चुनाव से पहले कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को जरूर उजागर कर दिया है।
जोधपुर में भी टिकट वितरण को लेकर विवाद और असंतोष देखने को मिल रहा है। टिकट के दावेदारों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे कई नेता और कार्यकर्ता अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि टिकट से वंचित होने वाले नेताओं और उनके समर्थकों को किस तरह साथ रखा जाए, ताकि वे निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरकर पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के सामने चुनौती न बनें।
दरअसल, नगर निकाय चुनावों में टिकट वितरण विधानसभा या लोकसभा चुनावों से अलग तरह की चुनौती पैदा करता है। स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़, वार्ड में लोकप्रियता, पुराने राजनीतिक संबंध और स्थानीय गुटबाजी का सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है। यही वजह है कि एक टिकट के लिए कई दावेदार होने पर पार्टी के भीतर तनाव तेजी से बढ़ जाता है। राजस्थान में इस बार भी कई वार्डों में एक ही पार्टी से कई दावेदार सामने आए हैं।
जयपुर में भी कांग्रेस के अंदर टिकट बंटवारे को लेकर नाराजगी सामने आ चुकी है। वरिष्ठ नेता आर.आर. तिवारी ने टिकट वितरण के विरोध में धरना दिया और पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि टिकटों को लेकर पहले सहमति बनी थी, लेकिन बाद में फैसलों में बदलाव कर दिया गया। उन्होंने कुछ टिकटों को लेकर राजनीतिक दबाव के आरोप भी लगाए और कहा कि ऐसे लोगों को टिकट दिए जा रहे हैं जिन्होंने पहले कांग्रेस का विरोध किया था।
इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि कांग्रेस के सामने सिर्फ विपक्षी दलों से मुकाबले की चुनौती नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर असंतोष को नियंत्रित करना भी बड़ी परीक्षा बन गया है। टिकट न मिलने से नाराज कार्यकर्ता अगर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ते हैं, तो इसका सीधा नुकसान आधिकारिक उम्मीदवार को हो सकता है। स्थानीय चुनावों में कई बार कुछ सौ वोटों का अंतर ही जीत और हार तय कर देता है, इसलिए बागी उम्मीदवारों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
राजस्थान के कई शहरों में टिकट वितरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के सामने चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। हाल के दिनों में टिकटों को लेकर दोनों पार्टियों के भीतर विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और आपसी खींचतान की खबरें सामने आई हैं। कुछ जगहों पर उम्मीदवार चयन को लेकर नेताओं के बीच तीखी बहस तक हुई है। इससे यह संकेत मिल रहा है कि स्थानीय चुनावों में टिकट वितरण कितना संवेदनशील मुद्दा बन चुका है।
इस चुनाव की खास बात यह भी है कि उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टियों ने अंतिम समय तक नामों को सार्वजनिक करने में सावधानी बरती। रिपोर्टों के मुताबिक, कई दावेदारों को आधिकारिक सूची जारी होने से पहले फोन के जरिए जानकारी दी गई। राजनीतिक दलों की कोशिश थी कि टिकट से नाराज दावेदारों को निर्दलीय नामांकन दाखिल करने से रोका जा सके। लेकिन इसके बावजूद कई जगहों पर असंतोष सामने आया।
अब नजर इस बात पर है कि कांग्रेस नेतृत्व बीकानेर और जोधपुर समेत दूसरे शहरों में उठे विवाद को कैसे संभालता है। अगर पार्टी समय रहते नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को मना लेती है तो नुकसान को सीमित किया जा सकता है। लेकिन अगर टिकट को लेकर बगावत बढ़ती है और नाराज नेता निर्दलीय मैदान में उतरते हैं, तो कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवारों के लिए चुनावी समीकरण मुश्किल हो सकते हैं।
राजस्थान के नगर निकाय चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनके नतीजे स्थानीय राजनीति के साथ-साथ भविष्य की बड़ी चुनावी रणनीतियों का संकेत दे सकते हैं। वार्ड स्तर पर जीत-हार से नेताओं की स्थानीय पकड़ का अंदाजा लगाया जाएगा और राजनीतिक दलों को यह भी पता चलेगा कि जनता के बीच उनके संगठन की स्थिति कितनी मजबूत है।
फिलहाल राजस्थान में चुनावी माहौल गर्म हो चुका है और टिकट वितरण कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। बीकानेर में मारपीट और सिंबल विवाद से लेकर जयपुर और जोधपुर में दावेदारों की नाराजगी तक, पार्टी के सामने संगठन को एकजुट रखने की चुनौती है। अब यह देखना अहम होगा कि कांग्रेस इस अंदरूनी घमासान को शांत कर पाती है या टिकट की लड़ाई चुनावी मैदान में बगावत का रूप लेती है।



