
साल 2026 का रक्षाबंधन कई मायनों में विशेष रहने वाला है। इस बार भाई-बहन के पवित्र पर्व के दिन आंशिक चंद्र ग्रहण का भी संयोग बन रहा है, जिसके चलते लोगों के मन में सूतक काल, भद्रा और राखी बांधने के शुभ समय को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। हालांकि ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस बार भारत में चंद्र ग्रहण दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक काल भारत में मान्य नहीं होगा। यही कारण है कि रक्षाबंधन का पर्व देशभर में बिना किसी धार्मिक बाधा के पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा सकेगा।
खगोलीय गणनाओं के अनुसार वर्ष 2026 का यह आंशिक चंद्र ग्रहण 28 अगस्त को भारतीय समयानुसार सुबह लगभग 06:53 बजे शुरू होगा और दोपहर करीब 12:32 बजे समाप्त होगा। ग्रहण की कुल अवधि लगभग 5 घंटे 39 मिनट रहेगी। यह ग्रहण मुख्य रूप से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप तथा अफ्रीका के कई हिस्सों में दिखाई देगा, जबकि भारत में उस समय चंद्रमा क्षितिज के नीचे होने के कारण ग्रहण दिखाई नहीं देगा। धार्मिक परंपराओं के अनुसार सूतक काल तभी प्रभावी माना जाता है जब ग्रहण संबंधित स्थान पर प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे। इसलिए भारत में इस ग्रहण के कारण न तो सूतक लगेगा और न ही पूजा-पाठ या अन्य शुभ कार्यों पर कोई रोक रहेगी।
रक्षाबंधन के दिन बहनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात राखी बांधने का शुभ समय होता है। पंचांग के अनुसार इस बार भद्रा काल सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगा। ऐसे में सूर्योदय के बाद से ही शुभ मुहूर्त में भाई की कलाई पर राखी बांधी जा सकेगी। चूंकि भद्रा समाप्त हो चुकी होगी और सूतक भी लागू नहीं होगा, इसलिए पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठान, पूजा-पाठ और रक्षाबंधन के सभी पारंपरिक कार्यक्रम सामान्य रूप से संपन्न किए जा सकेंगे। मंदिरों के कपाट भी खुले रहेंगे और किसी प्रकार का धार्मिक प्रतिबंध लागू नहीं होगा।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि ग्रहण और रक्षाबंधन का एक साथ पड़ना खगोलीय दृष्टि से जरूर विशेष है, लेकिन भारत में ग्रहण अदृश्य होने के कारण श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। बहनें बिना किसी संशय के अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध सकती हैं और परिवार सामान्य रूप से पर्व का आनंद ले सकते हैं। हालांकि कई ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि ग्रहों की स्थिति का कुछ राशियों पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन इसका त्योहार के शुभ कार्यों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं माना जाता।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक तथ्यों को अलग-अलग दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है। वैज्ञानिक रूप से चंद्र ग्रहण पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण होने वाली एक प्राकृतिक खगोलीय घटना है, जबकि धार्मिक परंपराओं में इसके संबंध में अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं को किसी भी भ्रम या अफवाह पर विश्वास करने के बजाय आधिकारिक पंचांग और विश्वसनीय जानकारी के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए।
कुल मिलाकर रक्षाबंधन 2026 पर चंद्र ग्रहण का संयोग भले ही चर्चा का विषय बना हुआ हो, लेकिन भारत में ग्रहण दिखाई न देने के कारण इस पर्व की खुशियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। भाई-बहन पूरे उल्लास और पारंपरिक विधि-विधान के साथ इस पर्व को मना सकेंगे। धार्मिक विशेषज्ञ भी लोगों से अपील कर रहे हैं कि वे अनावश्यक भ्रम से बचें और निर्धारित शुभ मुहूर्त में राखी बांधकर इस पावन पर्व का आनंद लें।



