
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा बदलाव देखने को मिला है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में आयोजित संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज से जुड़े एक कार्यक्रम में घोषणा की कि भदोही जिले का नाम एक बार फिर बदलकर “संत रविदास नगर” किया जाएगा। यह वही नाम है जिसे बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार के दौरान रखा गया था, लेकिन वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद इसे फिर से भदोही कर दिया गया था। योगी सरकार के इस फैसले को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा कि संत रविदास सामाजिक समरसता, समानता और मानवता के प्रतीक रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकार ने संत रविदास के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर उनकी विरासत का सम्मान कम करने का प्रयास किया था। योगी ने कहा कि अब जिले को फिर से “संत रविदास नगर” नाम देकर संत रविदास के योगदान को उचित सम्मान दिया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार सामाजिक न्याय और महापुरुषों की विरासत को संरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
भदोही, जिसे देश और दुनिया में “कारपेट सिटी” के नाम से भी जाना जाता है, कालीन उद्योग का एक प्रमुख केंद्र है। यह जिला संत रविदास की स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। बसपा सरकार के समय जिले का नाम संत रविदास नगर रखा गया था, लेकिन बाद में समाजवादी पार्टी सरकार ने इसे बदलकर फिर से भदोही कर दिया। अब योगी सरकार ने पुराने नाम को बहाल कर एक बार फिर इस मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला आगामी विधानसभा चुनावों से पहले दलित समुदाय, विशेषकर रविदास समाज तक पहुंच मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। संत रविदास के अनुयायियों की बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में है। ऐसे में इस निर्णय को दलित समाज के बीच राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी ने संत रविदास की 650वीं जयंती के अवसर पर राज्यव्यापी सामाजिक समरसता अभियान शुरू करने की भी घोषणा की है, जिससे इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
इस फैसले के बाद विपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विपक्ष का कहना है कि सरकार जनता के मूल मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए प्रतीकात्मक फैसले ले रही है, जबकि भाजपा इसे सामाजिक सम्मान और ऐतिहासिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम बता रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रमुख बहस का विषय बना रह सकता है और विभिन्न दल इसे अपने-अपने तरीके से जनता के बीच ले जाएंगे।
संत रविदास भारतीय भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत, समाज सुधारक और कवि माने जाते हैं। उन्होंने जाति भेदभाव, ऊंच-नीच और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज उठाई तथा समानता, भाईचारे और मानवता का संदेश दिया। उनके विचार आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। राज्य सरकार का कहना है कि जिले का नाम फिर से संत रविदास नगर किए जाने का उद्देश्य उनकी शिक्षाओं और योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना तथा उनकी स्मृति को स्थायी सम्मान देना है।



