
असम विधानसभा चुनाव 2026 के बीच ‘जस्टिस फॉर जुबीन’ का मुद्दा राज्य की राजनीति में एक भावनात्मक और चर्चित विषय बनकर उभरा है। मशहूर असमिया गायक Zubeen Garg की मौत के कई महीने बाद भी लोगों के बीच न्याय की मांग लगातार उठ रही है, लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि क्या यह मुद्दा चुनावी नतीजों को प्रभावित कर पाएगा या नहीं। ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के कई हिस्सों में जुबीन की तस्वीरें और उनके समर्थन में अभियान जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन आम मतदाता चुनावी मुद्दों में इसे प्राथमिकता देते नजर नहीं आ रहे।
दरअसल, सितंबर 2025 में सिंगापुर में जुबीन गर्ग की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हुई थी, जिसने पूरे असम को झकझोर दिया था। इसके बाद से उनके समर्थक लगातार “जस्टिस फॉर जुबीन” की मांग कर रहे हैं और इसे लेकर कई जगहों पर अभियान भी चलाया जा रहा है। हालांकि सिंगापुर की अदालत ने इसे दुर्घटनावश डूबने का मामला बताया, लेकिन राज्य के कई लोगों को अब भी इस पर संदेह है और वे विस्तृत जांच की मांग कर रहे हैं।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस ने इस मुद्दे को अपने चुनावी वादों में शामिल करते हुए सरकार बनने पर 100 दिनों के भीतर न्याय दिलाने का वादा किया है। वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma ने इसे अदालत का मामला बताते हुए राजनीति से दूर रखने की बात कही है। उनका कहना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दे को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल करना गलत है।
ग्राउंड रिपोर्ट यह भी बताती है कि युवाओं और कुछ वर्गों में इस मुद्दे को लेकर नाराजगी जरूर है, खासकर सरकार की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। लेकिन बड़ी संख्या में मतदाता अभी भी महंगाई, विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं। यही वजह है कि ‘जस्टिस फॉर जुबीन’ एक भावनात्मक मुद्दा तो बना हुआ है, लेकिन यह पूरी तरह से चुनावी एजेंडा नहीं बन पाया है।
जोरहाट और अन्य इलाकों में जुबीन के करीबी लोगों और प्रशंसकों का कहना है कि उन्हें न्याय जरूर चाहिए, लेकिन वे इसे राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाना चाहते। उनका मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखना चाहिए और इस मामले को राजनीति से दूर रखना ही बेहतर होगा।
कुल मिलाकर, असम चुनाव 2026 में ‘जस्टिस फॉर जुबीन’ एक ऐसा मुद्दा है जो लोगों की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसका चुनावी प्रभाव सीमित नजर आ रहा है। यह मुद्दा राजनीतिक दलों के लिए संवेदनशील जरूर है, लेकिन अंतिम फैसले में मतदाता पारंपरिक और रोजमर्रा के मुद्दों को ज्यादा महत्व देते दिखाई दे रहे हैं।


