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बंगाल चुनाव के बाद फिर गरमाई ‘बाबरी मस्जिद’ राजनीति

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद राज्य में एक बार फिर “बाबरी मस्जिद” को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। मुर्शिदाबाद से जुड़े इस विवाद के केंद्र में हैं पूर्व टीएमसी नेता और अब आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के प्रमुख Humayun Kabir, जिन्होंने चुनाव में दो सीटों पर जीत दर्ज करके सबको चौंका दिया। हालांकि राज्य में अब Bharatiya Janata Party की सरकार बन चुकी है और मुख्यमंत्री Suvendu Adhikari के नेतृत्व में नई सत्ता ने साफ संकेत दिए हैं कि धार्मिक ध्रुवीकरण के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाया जाएगा।

हुमायूं कबीर पिछले कई महीनों से मुर्शिदाबाद में “बाबरी मस्जिद शैली” की मस्जिद बनाने को लेकर चर्चा में रहे हैं। उन्होंने दावा किया था कि मस्जिद निर्माण के लिए नींव रखी जा चुकी है और बड़ी संख्या में लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। यही मुद्दा बंगाल चुनाव में बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया। बीजेपी ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताते हुए हिंदू वोटों को अपने पक्ष में एकजुट करने की कोशिश की, जबकि मुस्लिम बहुल इलाकों में कबीर को इसका फायदा मिला।

चुनाव परिणामों में हुमायूं कबीर ने रेजीनगर और नौदा जैसी दो महत्वपूर्ण सीटों पर जीत हासिल की। खास बात यह रही कि उनकी पार्टी चुनाव से महज कुछ महीने पहले ही बनी थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने बीजेपी और टीएमसी दोनों को चुनौती दी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुर्शिदाबाद और आसपास के मुस्लिम बहुल इलाकों में कबीर ने खुद को एक मजबूत अल्पसंख्यक नेता के रूप में स्थापित कर लिया है।

हालांकि अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी सरकार के रहते मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद जैसा ढांचा बन पाना संभव होगा? बीजेपी नेताओं ने पहले ही इस तरह की किसी भी कोशिश का विरोध किया है। विश्व हिंदू परिषद और कई हिंदू संगठनों ने भी खुली चुनौती देते हुए कहा था कि वे ऐसी किसी भी परियोजना को सफल नहीं होने देंगे। कुछ महीनों पहले लखनऊ और बंगाल में इस मुद्दे को लेकर पोस्टर और विरोध प्रदर्शन भी हुए थे।

दरअसल, यह विवाद सिर्फ एक मस्जिद तक सीमित नहीं रहा बल्कि बंगाल की राजनीति में पहचान और ध्रुवीकरण का बड़ा प्रतीक बन गया। बीजेपी ने “काबा बनाम काली” और “राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद” जैसे नारों के जरिए हिंदू वोटरों को साधने की कोशिश की। दूसरी ओर हुमायूं कबीर और उनके समर्थकों ने इसे धार्मिक अधिकार और पहचान का मुद्दा बताया। राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक यह रणनीति दोनों पक्षों को अपने-अपने वोट बैंक मजबूत करने में मददगार साबित हुई।

मामला और ज्यादा संवेदनशील तब हो गया जब AIMIM प्रमुख Asaduddin Owaisi ने भी चुनाव से पहले हुमायूं कबीर की पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया। इससे बंगाल की मुस्लिम राजनीति में नया समीकरण बनता दिखाई दिया। माना जा रहा है कि टीएमसी से नाराज मुस्लिम वोटरों का एक हिस्सा कबीर के साथ चला गया, जिससे राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला।

इस बीच बीजेपी ने भी मुर्शिदाबाद में राम मंदिर निर्माण की घोषणा करके राजनीतिक जवाब देने की कोशिश की। पार्टी नेताओं ने कहा कि अगर बाबरी मस्जिद शैली की मस्जिद बन सकती है तो राम मंदिर भी बनेगा। इसके बाद दोनों पक्षों के समर्थकों के बीच बयानबाजी और तेज हो गई।

नई बीजेपी सरकार बनने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर भी इस परियोजना की जांच और अनुमति को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी धार्मिक ढांचे के निर्माण के लिए जमीन, अनुमति और स्थानीय प्रशासन की मंजूरी जरूरी होगी। ऐसे में बीजेपी सरकार इस मुद्दे पर सख्त रुख अपना सकती है।

फिलहाल मुर्शिदाबाद का यह मुद्दा सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रह गया है। राष्ट्रीय राजनीति में भी इसे हिंदुत्व बनाम अल्पसंख्यक पहचान की नई लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है, क्योंकि एक तरफ हुमायूं कबीर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं तो दूसरी ओर बीजेपी इसे अपनी वैचारिक जीत के रूप में पेश करना चाहती है।

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