
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाने और स्थानीय बुनकरों का समर्थन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत की हथकरघा परंपरा केवल वस्त्र निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विरासत, कला, कौशल और लाखों परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार भी है। प्रधानमंत्री ने लोगों से आग्रह किया कि वे अधिक से अधिक स्थानीय स्तर पर बने कपड़े पहनें और सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो रहे ‘GRWM’ (Get Ready With Me) ट्रेंड के माध्यम से भारतीय हथकरघा वस्त्रों को बढ़ावा दें। उनका मानना है कि यदि युवा इस डिजिटल ट्रेंड के जरिए स्वदेशी कपड़ों को प्रदर्शित करेंगे तो इससे देश के बुनकरों और हस्तशिल्प उद्योग को नई पहचान मिलेगी।
प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि भारत का हर राज्य अपनी विशिष्ट हथकरघा परंपरा और बुनाई शैली के लिए जाना जाता है। बनारसी सिल्क, कांचीपुरम सिल्क, चंदेरी, महेश्वरी, पोचमपल्ली, पटोला, इकत, जामदानी और पश्मीना जैसे वस्त्र केवल फैशन का हिस्सा नहीं बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों के पीछे हजारों कारीगरों की वर्षों की मेहनत, पारंपरिक तकनीक और पीढ़ियों से चली आ रही कला छिपी होती है। ऐसे में जब लोग स्थानीय हथकरघा उत्पाद खरीदते हैं तो वे केवल एक कपड़ा नहीं खरीदते, बल्कि लाखों बुनकर परिवारों के जीवन और रोजगार को भी मजबूत करते हैं।
प्रधानमंत्री ने विशेष रूप से युवाओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं से कहा कि वे भारतीय परिधानों के साथ अपना ‘Get Ready With Me’ वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा करें। उनका मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म आज लोगों तक पहुंचने का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं और यदि भारतीय युवा इसमें स्वदेशी उत्पादों को शामिल करेंगे तो देश के हथकरघा उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिल सकती है। उन्होंने कहा कि ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाने में आम नागरिकों की भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य भारत के हथकरघा उद्योग, पारंपरिक बुनाई कला और इस क्षेत्र से जुड़े लाखों बुनकरों के योगदान को सम्मान देना है। यह दिन वर्ष 1905 के स्वदेशी आंदोलन की ऐतिहासिक शुरुआत की भी याद दिलाता है, जब विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का व्यापक अभियान शुरू हुआ था। आज भी हथकरघा क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण रोजगार और महिला सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय हथकरघा उद्योग को आधुनिक बाजार, ई-कॉमर्स और डिजिटल प्रचार के माध्यम से नई गति मिल सकती है। बदलते फैशन ट्रेंड के बीच यदि पारंपरिक वस्त्रों को आधुनिक प्रस्तुति के साथ युवाओं तक पहुंचाया जाए तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मांग और बढ़ सकती है। सोशल मीडिया अभियान भी इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि आज फैशन और लाइफस्टाइल से जुड़े ट्रेंड तेजी से डिजिटल माध्यमों के जरिए लोकप्रिय होते हैं।
प्रधानमंत्री की इस अपील को आत्मनिर्भर भारत और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की व्यापक पहल का हिस्सा माना जा रहा है। उनका संदेश केवल पारंपरिक कपड़े पहनने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य भारतीय बुनकरों, कारीगरों और छोटे उद्यमियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना भी है। आने वाले समय में यदि अधिक लोग स्थानीय हथकरघा उत्पादों को अपनी दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाते हैं, तो इससे भारतीय वस्त्र उद्योग को नई मजबूती मिलने के साथ-साथ देश की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को भी वैश्विक स्तर पर और अधिक पहचान मिल सकती है।



