
तुर्की के इस्तांबुल में कश्मीर पर जुटे पाकिस्तानी समर्थक, भारत पर लगाए आरोप; पुरानी तस्वीरों के इस्तेमाल पर भी उठा सवाल
तुर्की के इस्तांबुल में कश्मीर मुद्दे पर आयोजित एक सम्मेलन को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से जारी कूटनीतिक तनाव के संदर्भ में नई चर्चा शुरू हो गई है। 30 अक्टूबर को आयोजित ‘कश्मीर इस्तांबुल समिट 2026’ में राजनयिकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का आयोजन तुर्की के संगठन TÜGVA ने कश्मीर ब्लैक डे के अवसर पर किया था। कार्यक्रम में कश्मीर के राजनीतिक, मानवीय और कानूनी पहलुओं पर चर्चा की गई।
सम्मेलन के दौरान वक्ताओं ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार, हिरासत, इंटरनेट प्रतिबंध, घरों और मस्जिदों पर कार्रवाई तथा लोगों की आवाजाही से जुड़े मुद्दे उठाए। कुछ वक्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान कश्मीर की स्थिति की ओर पर्याप्त रूप से नहीं जाने पर भी सवाल किया। उन्होंने कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दों के बीच समानताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर कश्मीर के हालात को लेकर अधिक चर्चा होनी चाहिए। ये आरोप सम्मेलन में शामिल वक्ताओं के विचार थे, न कि किसी स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष।
कार्यक्रम में पाकिस्तान के इस्तांबुल स्थित वाणिज्य दूतावास के प्रतिनिधि उजैर महमूद घुम्मन और पाकिस्तान के महावाणिज्य दूत ख्वाजा खुर्रम नईम सहित कई लोग शामिल हुए। इसके अलावा वर्ल्ड कश्मीर फ्रीडम मूवमेंट के अध्यक्ष डॉ. मुजम्मिल अय्यूब ठाकुर, इस्लाम एंड ग्लोबल अफेयर्स सेंटर के निदेशक डॉ. सामी अल-अरियन और तुर्की रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष डॉ. एनेस बायरकली ने भी अलग-अलग सत्रों में हिस्सा लिया। चर्चा में क्षेत्रीय स्थिरता, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून की भूमिका जैसे विषय शामिल रहे।
सम्मेलन को लेकर आलोचना भी सामने आई है। पत्रकार राजा मुनीब ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि कार्यक्रम में कश्मीर के बारे में अपना पक्ष रखने के लिए करीब एक दशक पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने इसे पाकिस्तान के पुराने नैरेटिव को दोबारा सामने लाने की कोशिश बताया। इस आलोचना के बाद सम्मेलन में दिखाई गई तस्वीरों और प्रस्तुत सामग्री की प्रामाणिकता को लेकर सवाल उठे हैं। हालांकि, तस्वीरों के संदर्भ और उनकी तारीखों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना उनके बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन भी कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठा चुके हैं। सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच विवादों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर और संबंधित प्रस्तावों के दायरे में बातचीत के जरिए सुलझाने की बात कही थी। भारत ने पहले भी कश्मीर पर तीसरे पक्ष की मध्यस्थता या टिप्पणी का विरोध किया है और कहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है तथा पाकिस्तान के साथ सभी मुद्दे द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाए जाने चाहिए।
भारत और तुर्की के संबंधों में कश्मीर का मुद्दा पहले भी तनाव की वजह रहा है। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद एर्दोगन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का जिक्र किया था, जिस पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी। इसके बाद भी तुर्की की ओर से अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर को लेकर बयान दिए जाते रहे हैं। भारत का लगातार यही रुख रहा है कि दूसरे देशों को उसके आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए।
इस्तांबुल सम्मेलन ऐसे समय हुआ है, जब तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक और रक्षा सहयोग भी चर्चा में है। तीनों देशों ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के तहत रणनीतिक राजनीतिक और रक्षा समिति बनाई है, जिसकी पहली बैठक अगस्त 2026 में इस्तांबुल में हुई थी। ऐसे क्षेत्रीय समीकरणों के बीच कश्मीर पर आयोजित सम्मेलन को भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक मतभेदों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, इस्तांबुल में आयोजित सम्मेलन ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में लाने की कोशिश की है। जहां आयोजकों और वक्ताओं ने इसे राजनीतिक, मानवीय और कानूनी पहलुओं पर विचार-विमर्श का मंच बताया, वहीं आलोचकों ने इसमें पाकिस्तान समर्थित भारत-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। इस पूरे घटनाक्रम पर भारत की स्थापित स्थिति में कोई बदलाव नहीं है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है और इस मुद्दे पर किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है।



