
निवेश करते समय ज्यादातर लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि उनका पैसा सुरक्षित है या नहीं और निवेश से कितना रिटर्न मिल रहा है। लेकिन कई बार निवेश में मूलधन सुरक्षित रहने के बावजूद वह आपके लिए “डेड मनी” बन सकता है। यानी पैसा किसी फंड या निवेश विकल्प में लगा हुआ है, लेकिन लंबे समय तक उससे अच्छा रिटर्न नहीं मिल रहा। ऐसे निवेश का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि पैसा तो आपके नाम पर मौजूद रहता है, लेकिन वह आपकी संपत्ति बढ़ाने में प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाता।
डेड मनी का मतलब यह नहीं है कि निवेशक को हर समय नुकसान ही हो रहा हो। कई मामलों में निवेश की गई मूल राशि सुरक्षित रहती है, लेकिन उसका रिटर्न बेहद कम होता है या लंबे समय तक कोई खास वृद्धि नहीं दिखाई देती। ऐसे में निवेशक यह सोचकर संतुष्ट हो सकता है कि उसका पैसा डूबा नहीं है, लेकिन वास्तविक नुकसान उस अवसर का होता है, जहां यही पैसा किसी बेहतर विकल्प में निवेश करके अधिक रिटर्न दे सकता था। इसे निवेश की भाषा में “ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट” कहा जाता है।
मान लीजिए किसी व्यक्ति ने अपना पैसा ऐसे फंड में लगाया है, जिसका प्रदर्शन लगातार कमजोर बना हुआ है। दूसरी ओर, उसी श्रेणी के दूसरे फंड बेहतर रिटर्न दे रहे हैं। ऐसी स्थिति में सिर्फ इसलिए कमजोर फंड में बने रहना कि मूल पैसा सुरक्षित है, निवेशक के लिए लंबे समय में नुकसानदायक साबित हो सकता है। क्योंकि उसका पैसा बेहतर प्रदर्शन करने वाले विकल्पों से मिलने वाले संभावित रिटर्न से दूर रह जाता है।
हालांकि हर कमजोर प्रदर्शन करने वाले निवेश को तुरंत डेड मनी मानकर बेच देना भी सही रणनीति नहीं है। किसी फंड या निवेश के प्रदर्शन का मूल्यांकन पर्याप्त समय के आधार पर किया जाना चाहिए। रिपोर्ट के अनुसार, अगर कोई फंड लगातार 4, 6 या 8 क्वार्टर यानी करीब 1 से 2 साल तक कमजोर प्रदर्शन कर रहा है, तो निवेशक को उस पर गंभीरता से नजर डालनी चाहिए।
सिर्फ अपने निवेश के रिटर्न को देखना काफी नहीं है। यह तुलना करना भी जरूरी है कि उसी कैटेगरी के दूसरे फंड या निवेश विकल्प कैसा प्रदर्शन कर रहे हैं। अगर बाजार की स्थिति सामान्य है और उसी श्रेणी के अन्य फंड अच्छा रिटर्न दे रहे हैं, लेकिन आपका निवेश लगातार पीछे चल रहा है, तो यह संकेत हो सकता है कि आपके पोर्टफोलियो की समीक्षा करने की जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई फंड लगातार 4 से 8 क्वार्टर तक कमजोर प्रदर्शन करे और उसकी तुलना में उसी कैटेगरी के अन्य फंड बेहतर नतीजे दे रहे हों, तो निवेशक को अपने पोर्टफोलियो का आकलन करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में तुरंत निवेश बेच देना चाहिए, बल्कि निवेश के लक्ष्य, जोखिम, अवधि और उपलब्ध विकल्पों को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना जरूरी है।
निवेश की दुनिया में केवल पैसा बचाकर रखना ही पर्याप्त नहीं है। महंगाई और समय के साथ संपत्ति की वास्तविक क्रय शक्ति भी प्रभावित होती है। अगर निवेश लंबे समय तक पर्याप्त रिटर्न नहीं दे रहा है, तो मूलधन सुरक्षित होने के बावजूद उसकी वास्तविक उपयोगिता कम हो सकती है। इसलिए समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करना जरूरी है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं कोई निवेश सिर्फ पैसा रोककर तो नहीं बैठा है।
कुल मिलाकर, “डेड मनी” का जोखिम निवेशकों को यह समझाता है कि निवेश का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि पैसा सुरक्षित है या नहीं। यह देखना भी जरूरी है कि निवेश अपने लक्ष्य के अनुरूप प्रदर्शन कर रहा है या नहीं और क्या उसी श्रेणी में बेहतर विकल्प उपलब्ध हैं। सही समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा और सोच-समझकर लिए गए फैसले निवेशक को लंबे समय तक कम रिटर्न वाले निवेश में फंसे रहने से बचा सकते हैं।



