
देश में बड़ी संख्या में बिना वैध बीमा के चल रहे वाहनों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि सड़कों पर चल रहे लगभग 56 प्रतिशत वाहनों के पास अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा नहीं है, जो न केवल मोटर वाहन अधिनियम का उल्लंघन है बल्कि सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों के अधिकारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इस स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और बीमा नियामक IRDAI को निर्देश दिया है कि वे ऐसा पायलट प्रोजेक्ट तैयार करें, जिसके तहत बिना वैध बीमा वाले वाहनों को पेट्रोल या डीजल देने पर रोक लगाने की व्यवस्था पर विचार किया जा सके। साथ ही अदालत ने ऐसे वाहनों के खिलाफ स्वचालित ई-चालान जारी करने की व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 16.54 करोड़ वाहन बिना बीमा के चल रहे हैं। अदालत ने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत प्रत्येक वाहन के लिए थर्ड पार्टी बीमा अनिवार्य है। यदि कोई दुर्घटना होती है और वाहन बीमित नहीं होता, तो पीड़ितों को मुआवजा पाने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीमा केवल कानूनी औपचारिकता नहीं बल्कि सड़क सुरक्षा और दुर्घटना पीड़ितों के हितों की रक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम है।
अदालत ने तकनीक के अधिक प्रभावी उपयोग पर भी जोर दिया। इसके तहत राष्ट्रीय राजमार्गों और प्रमुख सड़कों पर लगे ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकॉग्निशन (ANPR) कैमरों को बीमा डेटाबेस और VAHAN पोर्टल से जोड़ने का सुझाव दिया गया है। इससे बिना बीमा वाले वाहनों की पहचान स्वतः हो सकेगी और उनके मालिकों को ई-चालान भेजे जा सकेंगे। इसके अलावा पुलिस अधिकारियों को ऐसे डिजिटल उपकरण या मोबाइल एप उपलब्ध कराने की भी बात कही गई है, जिनकी सहायता से मौके पर ही वाहन के बीमा की स्थिति की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने नए वाहनों के लिए अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा की अवधि बढ़ाने का भी निर्देश दिया है। अब नई कारों के लिए चार वर्ष और नए दोपहिया वाहनों के लिए छह वर्ष का थर्ड पार्टी बीमा अनिवार्य होगा। इससे पहले यह अवधि क्रमशः तीन और पांच वर्ष थी। अदालत का मानना है कि इस बदलाव से अधिक समय तक वाहन बीमा के दायरे में रहेंगे और बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या कम करने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि “नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल” जैसी व्यवस्था भविष्य में लागू होती है तो वाहन मालिकों के लिए समय पर बीमा का नवीनीकरण कराना लगभग अनिवार्य हो जाएगा। हालांकि यह फिलहाल केवल पायलट परियोजना के रूप में विचाराधीन है और इसके क्रियान्वयन से पहले केंद्र सरकार तथा संबंधित एजेंसियां इसकी व्यवहारिकता, तकनीकी व्यवस्था और कानूनी पहलुओं का विस्तृत अध्ययन करेंगी। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह प्रणाली सफल रहती है तो इससे सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिलने की संभावना बढ़ेगी और देश में बीमा नियमों का पालन भी अधिक प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सकेगा।



