
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस रिपोर्ट को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है, जिसमें दावा किया गया था कि चीन की कुछ संस्थाओं ने ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकाने की हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराई थीं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन तस्वीरों का इस्तेमाल जुलाई में जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए ईरानी मिसाइल हमले की तैयारी में किया गया हो सकता है। इस हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी और चार अन्य घायल हुए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान को 17 जुलाई को हुए हमले से पहले और उसके बाद जॉर्डन के Muwaffaq Salti Air Base की सैटेलाइट तस्वीरें मिली थीं। अमेरिकी अधिकारियों ने कथित तौर पर इन तस्वीरों को हमले से जोड़कर देखा है। हालांकि, अभी यह स्पष्ट नहीं है कि तस्वीरों की आपूर्ति करने वाली कौन-कौन सी चीनी संस्थाएं इसमें शामिल थीं। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि अमेरिकी अधिकारियों ने सीधे तौर पर चीन की सरकार पर इस हमले में शामिल होने का आरोप नहीं लगाया है।
हमले में ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों ने अमेरिकी सैनिकों के आवासीय इलाके को निशाना बनाया था। तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत के अलावा चार लोग घायल हुए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैटेलाइट तस्वीरें किसी सैन्य ठिकाने की ताजा स्थिति, वहां हुए बदलाव और हमले के बाद हुए नुकसान का आकलन करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, ईरान के पास अपने सैटेलाइट, मानव स्रोत और रूस से मिलने वाली खुफिया जानकारी जैसे दूसरे स्रोत भी हैं, इसलिए किसी एक स्रोत को हमले का निर्णायक कारण मानना अभी जल्दबाजी होगी।
इसी रिपोर्ट को लेकर जब डोनाल्ड ट्रंप से सवाल किया गया तो उन्होंने चीन के खिलाफ तत्काल कोई कड़ा रुख अपनाने से इनकार किया। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका भी चीन की जासूसी करता है और चीन भी अमेरिका पर नजर रखता है। उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने संबंधों को भी सकारात्मक बताया और कहा कि दोनों देशों ने एक-दूसरे के साथ उचित व्यवहार किया है।
इस बीच चीन ने भी इन आरोपों को खारिज किया है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, जब वॉशिंगटन की ओर से यह मुद्दा चीनी अधिकारियों के सामने उठाया गया तो चीन ने आरोपों को चुनौती दी और सबूत मांगे। बीजिंग की ओर से यह भी कहा गया है कि ईरान के साथ उसका सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है। इसलिए फिलहाल यह मामला आरोप, खुफिया आकलन और आधिकारिक इनकार के बीच बना हुआ है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। अमेरिकी प्रशासन ने इससे पहले भी कुछ चीनी कंपनियों पर ईरान को सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराने के आरोप लगाए थे। मई में अमेरिका ने तीन चीनी कंपनियों पर इसी तरह की गतिविधियों को लेकर प्रतिबंध लगाए थे। वॉशिंगटन को यह चिंता भी है कि ऐसी खुफिया जानकारी ईरान को अमेरिकी सैन्य ठिकानों के अलावा क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी नौसैनिक संपत्तियों को निशाना बनाने में मदद कर सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच संभावित मुलाकात भी इसी महीने होने वाली है। ऐसे में चीन की ओर से ईरान को कथित सैन्य या खुफिया मदद का मुद्दा दोनों नेताओं की बातचीत में अहम हो सकता है। हालांकि, ट्रंप के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस मुद्दे को सार्वजनिक तौर पर चीन के साथ टकराव बढ़ाने वाले स्तर तक ले जाने से फिलहाल बच रहे हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर हुए घातक हमले और चीनी सैटेलाइट तस्वीरों के बीच संबंध को लेकर अभी कई सवाल बाकी हैं। रिपोर्ट में चीनी संस्थाओं की कथित भूमिका का जिक्र जरूर है, लेकिन चीन की सरकार की सीधी भागीदारी का सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में अमेरिका की जांच और चीन की प्रतिक्रिया इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।



