
अमेरिका में नौकरी करने की तैयारी कर रहे भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए H-1B वीजा से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने कुछ H-1B वीजा आवेदनों पर लागू 1 लाख डॉलर की भुगतान शर्त को एक और साल के लिए बढ़ा दिया है। अब यह व्यवस्था सितंबर 2027 तक जारी रहने वाली है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब इस शुल्क को लेकर अमेरिकी अदालतों में कानूनी लड़ाई भी चल रही है।
अमेरिकी प्रशासन की ओर से जारी आदेश के मुताबिक, अमेरिका से बाहर मौजूद ऐसे नए H-1B आवेदकों के लिए, जो इस व्यवस्था के दायरे में आते हैं, नियोक्ता को 1 लाख डॉलर का भुगतान करना होगा। भुगतान किए बिना संबंधित आवेदक के अमेरिका में प्रवेश पर प्रतिबंध लागू रहेगा। हालांकि, आदेश में राष्ट्रीय हित से जुड़े मामलों में कुछ अपवादों का प्रावधान भी रखा गया है।
इस फैसले का असर खास तौर पर उन विदेशी प्रोफेशनल्स पर पड़ सकता है जो अमेरिका में नई नौकरी हासिल करके H-1B वीजा के जरिए वहां जाना चाहते हैं। वहीं, पहले से अमेरिका में रह रहे मौजूदा H-1B वीजा धारकों के मामले में स्थिति अलग है। रिपोर्टों के मुताबिक, मौजूदा वीजा धारकों के नवीनीकरण को इस 1 लाख डॉलर की नई भुगतान शर्त के दायरे में नहीं रखा गया है।
H-1B वीजा अमेरिका में विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को रोजगार देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय इस वीजा के जरिए अमेरिका में काम करते हैं। अमेरिकी वित्त वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार, स्वीकृत H-1B याचिकाओं के लाभार्थियों में करीब 71 प्रतिशत भारत में जन्मे लोग थे। ऐसे में नई नीति भारतीय प्रोफेशनल्स और उन्हें नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि 1 लाख डॉलर का भुगतान कर्मचारी से सीधे वीजा फीस के तौर पर लेने की व्यवस्था नहीं है। यह भुगतान संबंधित अमेरिकी नियोक्ता को करना होता है। ऐसे में विदेशी कर्मचारी को नियुक्त करने की लागत बढ़ जाती है और कंपनियों को अमेरिका के बाहर से H-1B कर्मचारी बुलाने से पहले अतिरिक्त आर्थिक बोझ का आकलन करना पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन का कहना है कि H-1B कार्यक्रम में कुछ कंपनियों, विशेष रूप से IT स्टाफिंग और आउटसोर्सिंग से जुड़ी कंपनियों की ओर से दुरुपयोग किया गया। प्रशासन का दावा है कि कम वेतन वाले विदेशी कर्मचारियों के जरिए अमेरिकी कर्मचारियों की जगह भरने की कोशिश की गई। सरकार के मुताबिक, नई फीस और H-1B चयन प्रक्रिया में किए गए बदलावों का उद्देश्य अधिक कुशल और ज्यादा वेतन वाली नौकरियों को प्राथमिकता देना है।
दूसरी ओर, कारोबारी समूहों और कंपनियों ने H-1B कार्यक्रम पर बढ़ती लागत को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि अमेरिकी कंपनियों को कई क्षेत्रों में जरूरी कुशल कर्मचारियों की जरूरत होती है और विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने की प्रक्रिया महंगी होने से कंपनियों की भर्ती क्षमता प्रभावित हो सकती है।
1 लाख डॉलर की फीस को लेकर अमेरिकी अदालतों में भी कानूनी लड़ाई चल रही है। इससे पहले एक संघीय अदालत में इस व्यवस्था को चुनौती दी गई थी और मामले में प्रशासन के खिलाफ फैसला आया था। इसके बाद मामला अपील की प्रक्रिया में पहुंचा। ऐसे में सितंबर 2027 तक आदेश बढ़ाए जाने के बावजूद इसकी कानूनी स्थिति आगे अदालतों के फैसलों पर निर्भर कर सकती है।
फिलहाल ट्रंप प्रशासन ने H-1B पर 1 लाख डॉलर की भुगतान शर्त को एक और साल के लिए जारी रखने का फैसला किया है। भारतीय IT प्रोफेशनल्स, अमेरिका जाने की तैयारी कर रहे नए आवेदकों और विदेशी कर्मचारियों की भर्ती करने वाली अमेरिकी कंपनियों के लिए आने वाले समय में इस नीति और अदालत में चल रही कार्यवाही पर नजर रखना अहम होगा।



