
25 दिन बमबारी के बीच मौत के साये में जीता रहा भारतीय इंजीनियर
ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण संघर्ष के बीच एक भारतीय इंजीनियर की आपबीती ने युद्ध की भयावहता को उजागर कर दिया है। भारत लौटे इंजीनियर केतन मेहता ने बताया कि उन्होंने ईरान में 25 दिन लगातार बमबारी के बीच बिताए, जहां हर पल मौत का डर उनके साथ था। उन्होंने कहा कि हालात इतने खराब थे कि हर दिन ऐसा लगता था कि किसी भी समय उनके होटल पर मिसाइल गिर सकती है और जान जा सकती है।
केतन मेहता अपने 18 साथियों के साथ बंदर अब्बास पोर्ट के पास एक जहाज की मरम्मत के लिए गए थे, लेकिन वहां पहुंचते ही स्थिति बदल गई। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने उन्हें अचानक बंधक बना लिया और कई दिनों तक जहाज पर ही कैद रखा। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, जहां उन्होंने करीब 50 दिन बिताए।
हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई, लेकिन उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुईं। जेल से छूटने के बाद उन्हें बंदर अब्बास के पास एक होटल में ठहराया गया, तभी अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए। केतन के अनुसार, हर दिन 100 से 200 बम और मिसाइलें उस इलाके में गिर रही थीं। होटल से कुछ ही दूरी पर स्थित नेवी बेस पर लगातार हमले हो रहे थे, जिससे पूरा इलाका दहशत और तबाही में डूब गया था।
उन्होंने बताया कि जैसे ही बमबारी शुरू होती, वे और उनके साथी होटल की ऊपरी मंजिल से नीचे भाग जाते, ताकि अगर हमला हो तो बचने की संभावना थोड़ी बढ़ सके। चारों ओर धमाकों की आवाज, जलते जहाज और टूटती इमारतों का मंजर इतना भयावह था कि हर दिन किसी डरावने सपने जैसा लगता था।
केतन ने यह भी बताया कि बंदर अब्बास पोर्ट पर खड़े कई जहाज बमबारी में पूरी तरह तबाह हो गए और हजारों मिसाइलें अलग-अलग सैन्य ठिकानों पर दागी गईं। इस दौरान वहां मौजूद हजारों लोगों की जान खतरे में थी। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें केवल अपने परिवार की याद आती थी और भारत लौटने की उम्मीद ही उन्हें जिंदा रखे हुए थी।
आखिरकार, भारतीय दूतावास और सरकार की मदद से केतन मेहता और उनके साथियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। वे बस के जरिए करीब 1900 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर आर्मेनिया पहुंचे और वहां से भारत लौट पाए। इस पूरे सफर के दौरान भी उन्हें रास्ते में धमाकों की आवाजें सुनाई देती रहीं, जिससे खतरे का एहसास लगातार बना रहा।
यह घटना न केवल युद्ध की भयावहता को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि विदेशों में काम कर रहे भारतीय किस तरह मुश्किल हालात का सामना करते हैं। केतन मेहता की यह कहानी उन हजारों लोगों की पीड़ा को बयां करती है, जो युद्ध क्षेत्रों में फंसकर हर दिन जिंदगी और मौत के बीच जूझते हैं।



