
पश्चिम एशिया में जारी अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi एक बेहद अहम पांच देशों की विदेश यात्रा पर रवाना होने जा रहे हैं। इस दौरे की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात यानी United Arab Emirates से होगी, जहां ऊर्जा सुरक्षा, तेल आपूर्ति और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे प्रमुख एजेंडा माने जा रहे हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच पीएम मोदी की यह यात्रा भारत की रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
विदेश मंत्रालय के मुताबिक प्रधानमंत्री 15 से 20 मई तक पांच देशों के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह UAE के अलावा नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली का भी दौरा करेंगे। लेकिन सबसे ज्यादा नजरें अबू धाबी में होने वाली उनकी बैठक पर टिकी हुई हैं, क्योंकि मौजूदा समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखना है। ईरान युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव बना हुआ है और दुनिया भर के तेल बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए खाड़ी क्षेत्र में किसी भी संकट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार पीएम मोदी UAE के राष्ट्रपति Mohamed bin Zayed Al Nahyan के साथ बैठक में दीर्घकालिक तेल और एलएनजी सप्लाई समझौतों पर चर्चा कर सकते हैं। इसके अलावा भारत के रणनीतिक तेल भंडार को बढ़ाने में UAE की भागीदारी पर भी बातचीत होने की संभावना है। भारत पहले से ही अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी यानी ADNOC के साथ कई ऊर्जा परियोजनाओं पर काम कर रहा है। माना जा रहा है कि मौजूदा युद्ध की स्थिति में भारत अपने ऊर्जा स्रोतों को सुरक्षित और विविध बनाने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है।
यह दौरा सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए भारत वैश्विक कूटनीति में संतुलन बनाने की भी कोशिश कर रहा है। भारत के संबंध Iran, Israel और खाड़ी देशों तीनों के साथ मजबूत हैं। ऐसे में मौजूदा युद्ध के दौरान भारत बेहद सावधानी से अपनी विदेश नीति को आगे बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पीएम मोदी की यह यात्रा इस बात का संकेत है कि भारत किसी एक पक्ष के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है।
युद्ध के कारण समुद्री व्यापार और शिपिंग मार्ग भी प्रभावित हुए हैं। भारतीय जहाजों और तेल टैंकरों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। भारतीय नौसेना पहले ही अरब सागर और ओमान की खाड़ी में अपनी गतिविधियां बढ़ा चुकी है ताकि भारतीय व्यापारिक जहाजों को सुरक्षा दी जा सके। इस बीच भारत सरकार लगातार तेल कंपनियों और सहयोगी देशों के साथ संपर्क बनाए हुए है ताकि घरेलू बाजार में ईंधन संकट पैदा न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि पीएम मोदी की यह पांच देशों की यात्रा आने वाले समय में भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक रणनीति को नई दिशा दे सकती है। खास तौर पर यूरोपीय देशों के साथ होने वाली बैठकों में निवेश, ग्रीन टेक्नोलॉजी, रक्षा सहयोग और इंडिया-यूरोप आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होने की संभावना है।



