
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने बुधवार, 2 सितंबर को वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल बढ़ा दी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर किए गए दावे के बाद कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार उछाल आया और इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ा। कारोबार शुरू होते ही सेंसेक्स करीब 700 अंक तक टूट गया, जबकि निफ्टी 24,000 के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे चला गया। निवेशकों में बढ़ती भू-राजनीतिक चिंता के बीच बाजार में चौतरफा बिकवाली देखने को मिली।
बुधवार को सेंसेक्स 76,471 के स्तर पर खुला और कुछ ही देर में गिरकर 76,135 तक पहुंच गया। यानी शुरुआती कारोबार में इसमें करीब 700 अंकों की गिरावट देखने को मिली। वहीं निफ्टी 24,055 के पिछले बंद स्तर के मुकाबले 23,858 पर खुला और बाद में 23,786 के आसपास पहुंच गया। बाजार में अचानक आई इस गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी।
बाजार में इस उथल-पुथल की सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर ट्रंप का बयान माना जा रहा है। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका के पास होर्मुज पर लगभग पूरा नियंत्रण है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है। यहां लंबे समय तक तनाव या जहाजों की आवाजाही बाधित होने की स्थिति में वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इसी आशंका ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेल दिया।
ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई और कुछ समय के लिए 96 डॉलर का स्तर भी पार कर गई। वहीं WTI क्रूड भी 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया। तेल की कीमतों में यह तेजी भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए विशेष चिंता का विषय है। महंगा कच्चा तेल भारत का आयात बिल बढ़ा सकता है, रुपये पर दबाव डाल सकता है और महंगाई को भी प्रभावित कर सकता है।
इसका असर शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टरों पर भी दिखाई दिया। शुरुआती कारोबार में कई प्रमुख शेयर दबाव में रहे और मिडकैप तथा स्मॉलकैप शेयरों में भी बिकवाली का माहौल रहा। निवेशकों ने वैश्विक अनिश्चितता के बीच जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बनानी शुरू कर दी।
भारतीय बाजार अकेला ऐसा बाजार नहीं रहा जहां गिरावट देखने को मिली। एशियाई बाजारों में भी दबाव बढ़ा। दक्षिण कोरिया का KOSPI करीब 3% तक टूट गया, जबकि जापान के Nikkei में भी 2% से ज्यादा की गिरावट देखने को मिली। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका-ईरान तनाव का असर केवल किसी एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि निवेशक वैश्विक स्तर पर जोखिम को लेकर सतर्क हो गए हैं।
अमेरिकी बाजार भी मंगलवार को कमजोर रहे थे। S&P 500 में करीब 0.7%, Dow Jones में 0.8% और Nasdaq में लगभग 1% की गिरावट दर्ज की गई। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी ने भी बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित किया। निवेशकों को आशंका है कि अगर ऊर्जा कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो महंगाई और ब्याज दरों को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की अहमियत इसलिए भी बेहद ज्यादा है क्योंकि दुनिया के तेल व्यापार का करीब 20% हिस्सा इस समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के लिए यह प्रमुख रास्ता है। ऐसे में यहां किसी भी बड़े सैन्य टकराव या समुद्री आवाजाही में रुकावट का असर पेट्रोल-डीजल से लेकर परिवहन, उद्योग और महंगाई तक पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
भारत के लिए स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल का आयात करता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर कंपनियों की लागत, परिवहन खर्च और महंगाई पर पड़ सकता है। साथ ही रुपये पर दबाव बढ़ने से आयात और भी महंगा हो सकता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में होने वाला हर बड़ा बदलाव भारतीय शेयर बाजार को प्रभावित करता है।
फिलहाल निवेशकों की नजर अमेरिका-ईरान तनाव के अगले घटनाक्रम, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों पर टिकी हुई है। अगर तनाव और बढ़ता है तो शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और तेज हो सकता है। वहीं तनाव कम होने और तेल की कीमतों में नरमी आने पर बाजार में राहत की उम्मीद बन सकती है।
कुल मिलाकर, ट्रंप के बयान, अमेरिका-ईरान तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने भारतीय शेयर बाजार के लिए बुधवार की शुरुआत बेहद खराब कर दी। सेंसेक्स में करीब 700 अंकों की गिरावट और निफ्टी के 24,000 के नीचे जाने से साफ है कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं का असर अब सीधे निवेशकों के भरोसे और बाजार की दिशा पर पड़ रहा है। आने वाले दिनों में तेल की कीमत और होर्मुज की स्थिति बाजार के लिए सबसे बड़े संकेतक साबित हो सकते हैं।



