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फाल्टा सीट पर दोबारा मतदान के आदेश से मचा सियासी बवाल

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के बीच फाल्टा विधानसभा सीट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने पूरे चुनावी माहौल को गरमा दिया है। चुनाव आयोग ने गंभीर अनियमितताओं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोपों के बाद इस सीट पर दोबारा मतदान (रीपोलिंग) कराने का फैसला लिया है। इस फैसले ने राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर दिया है। जानकारी के अनुसार, फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में मतदान के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से छेड़छाड़ और मतदान प्रक्रिया में गड़बड़ी की कई शिकायतें सामने आई थीं। आरोप था कि कुछ बूथों पर वोटिंग मशीन के बटन पर टेप चिपकाया गया था, जिससे मतदाताओं को भ्रमित करने की कोशिश की गई।

इन शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच शुरू की। चुनाव आयोग के विशेष पर्यवेक्षक की रिपोर्ट में भी चौंकाने वाले खुलासे हुए। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ मतदान केंद्रों पर CCTV कैमरे बंद पाए गए और “टेप हटाने” से पहले ही लगभग 58% वोटिंग हो चुकी थी। इससे चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए। इन्हीं गंभीर अनियमितताओं को देखते हुए चुनाव आयोग ने पूरे फाल्टा विधानसभा क्षेत्र के सभी बूथों पर पुनर्मतदान कराने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। यह कदम इस बात का संकेत है कि आयोग चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए सख्त रुख अपना रहा है।

इस बीच, दक्षिण 24 परगना जिले के अन्य क्षेत्रों—डायमंड हार्बर और मगराहाट पश्चिम—में भी EVM से छेड़छाड़ की शिकायतों के चलते 15 बूथों पर पुनर्मतदान कराया गया। यहां मतदान सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न हुआ। पूरे राज्य में कुल 294 सीटों पर चुनाव हो रहा है, जिसमें 293 सीटों के लिए मतदान पहले ही हो चुका है, जबकि फाल्टा सीट पर अब दोबारा मतदान कराया जाएगा। चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस सीट पर पुनर्मतदान के बाद ही अंतिम मतगणना और परिणाम घोषित किए जाएंगे।

राजनीतिक दृष्टि से यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है, जहां मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच है। फाल्टा सीट पर हुए घटनाक्रम ने न केवल चुनावी माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है, बल्कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और चुनावी पारदर्शिता पर भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा छेड़ दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के फैसले लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए जरूरी हैं, लेकिन यह भी साफ है कि चुनाव के दौरान बढ़ती तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियां भविष्य के लिए बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं।

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