
टाटा बोर्डरूम में बढ़ा विवाद, Article 121 के बहाने नोएल टाटा और चंद्रशेखरन आमने-सामने
टाटा संस में चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और कंपनी के बोर्ड के बीच विवाद अब कानूनी बहस का रूप ले चुका है। 17 सितंबर 2026 को हुई बोर्ड बैठक में चंद्रशेखरन को फरवरी 2027 के बाद एक और पांच साल के कार्यकाल के लिए चेयरमैन बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया गया था। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस प्रस्ताव का विरोध किया। इस पूरे विवाद के केंद्र में टाटा संस का Article 121 है, जिसमें ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की भूमिका और बोर्ड के फैसलों को लेकर विशेष प्रावधान हैं।
टाटा संस के बोर्ड में फिलहाल टाटा ट्रस्ट्स के दो नामित निदेशक हैं—नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन। 17 सितंबर की बैठक में वेणु श्रीनिवासन ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का समर्थन किया, जबकि नोएल टाटा ने इसके खिलाफ मतदान किया। बाकी बोर्ड सदस्यों के समर्थन के बाद कुल मतदान चंद्रशेखरन के पक्ष में रहा। इस दौरान बैठक की अध्यक्षता कर रहे स्वतंत्र निदेशक हरिश मनवानी के निर्णायक यानी कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया गया। टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि केवल कास्टिंग वोट के जरिए ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की आवश्यक मंजूरी की शर्त पूरी नहीं की जा सकती।
टाटा ट्रस्ट्स की मुख्य आपत्ति Article 121 की उस व्यवस्था को लेकर है, जिसके तहत कुछ बोर्ड फैसलों के लिए टाटा ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के बहुमत की सहमति जरूरी मानी जाती है। ट्रस्ट्स का तर्क है कि जब बोर्ड में ऐसे केवल दो निदेशक हैं, तो बहुमत का मतलब दोनों की सहमति से है। नोएल टाटा के विरोध के कारण यह शर्त पूरी नहीं हुई और इसलिए ट्रस्ट्स ने 17 सितंबर के प्रस्ताव को कानूनी रूप से अमान्य बताया है। ट्रस्ट्स ने यह भी कहा है कि कास्टिंग वोट का इस्तेमाल पूरे बोर्ड में बराबरी की स्थिति में हो सकता है, लेकिन इसे ट्रस्ट-नामित निदेशकों की अलग से आवश्यक सहमति के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, टाटा संस ने इस व्याख्या को स्वीकार नहीं किया है। कंपनी ने नोएल टाटा की आपत्ति के जवाब में कई कानूनी विशेषज्ञों की राय साझा की है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश यू.यू. ललित और पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी.एन. श्रीकृष्ण की राय में Article 121 की आवश्यकताओं का पालन किया गया और कास्टिंग वोट का इस्तेमाल वैध तरीके से किया जा सकता था। बी.एन. श्रीकृष्ण ने यह भी राय दी कि निदेशक की कंपनी के प्रति कानूनी और फिड्यूशियरी जिम्मेदारी को नामित करने वाली संस्था के प्रति जिम्मेदारी पर प्राथमिकता मिलती है।
इस विवाद में वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय भी सामने आई है। उनके मुताबिक Article 121 को सीधे पढ़ने पर चेयरमैन का कास्टिंग वोट दो परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है—पहली, जब ट्रस्ट्स द्वारा नामित निदेशकों के वोट बराबर हों और दूसरी, जब पूरे बोर्ड के वोट बराबर बंट जाएं। इस व्याख्या के आधार पर 17 सितंबर को पारित प्रस्ताव को वैध माना जा सकता है। हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स इस व्याख्या से सहमत नहीं है और उसका कहना है कि ट्रस्ट-नामित निदेशकों क



