
ईद से ठीक एक दिन पहले हैदराबाद की ऐतिहासिक मक्का मस्जिद में आयोजित ‘जलसा-यौम-उल-कुरान’ कार्यक्रम के दौरान AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पाकिस्तान पर बेहद तीखा हमला बोला। अपने भाषण में ओवैसी ने कहा कि पाकिस्तान को “इस्लाम की बेसिक बातें भी नहीं पता” और उस पर आरोप लगाया कि वह अपने पड़ोसियों के साथ अमन से रहने की बजाय लगातार टकराव और हिंसा का रास्ता चुनता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान के अफगानिस्तान पर हालिया हवाई हमलों को लेकर क्षेत्रीय राजनीति में पहले से तनाव बना हुआ है।
NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, ओवैसी ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की तुलना इजरायल के “छोटे भाई” से की और कहा कि दोनों देशों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे अपने पड़ोसियों को चैन से नहीं रहने देते। उन्होंने खास तौर पर अफगानिस्तान पर हुए पाकिस्तानी हवाई हमले का जिक्र किया और कहा कि जो देश खुद को इस्लाम का हिमायती बताता है, वही अगर अस्पतालों और बेबस लोगों पर हमले करे, तो फिर उसके दावों की सच्चाई पर सवाल उठना लाजिमी है।
रिपोर्ट के अनुसार, ओवैसी का यह बयान उस घटना की पृष्ठभूमि में आया, जिसमें 16 मार्च 2026 की आधी रात पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान के काबुल स्थित ओमिद नशामुक्ति केंद्र/अस्पताल पर एयर स्ट्राइक किए जाने का आरोप लगा। अफगान पक्ष का दावा है कि इस हमले में 400 से अधिक लोग मारे गए और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी ने इस कार्रवाई को मानवीय और इस्लामी सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन बताया था।
ओवैसी ने अपने भाषण में इसी बिंदु को उठाते हुए कहा कि इस्लाम कभी भी निर्दोषों, बीमारों या कमजोर लोगों को निशाना बनाने की इजाजत नहीं देता। उनका कहना था कि अगर किसी देश की कार्रवाई से इलाज करा रहे मरीज, आम नागरिक और समाज के कमजोर तबके प्रभावित हो रहे हैं, तो फिर उसे किसी भी धार्मिक या नैतिक आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। यही वजह है कि उन्होंने पाकिस्तान के रवैये को न केवल राजनीतिक बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी कटघरे में खड़ा किया।
इस कार्यक्रम की खास बात यह भी रही कि ओवैसी ने सिर्फ पाकिस्तान-अफगानिस्तान मुद्दे पर ही बात नहीं की, बल्कि ईरान, इजरायल-अमेरिका संघर्ष और भारत में मुस्लिम समुदाय से जुड़ी हाल की चर्चित घटनाओं पर भी खुलकर बयान दिया। यानी उनका भाषण केवल एक अंतरराष्ट्रीय टिप्पणी नहीं था, बल्कि घरेलू और वैश्विक मुस्लिम समाज से जुड़े मुद्दों को जोड़ते हुए दिया गया एक व्यापक राजनीतिक संदेश भी था।
‘जलसा-यौम-उल-कुरान’ का आयोजन हर साल कुरान की शिक्षाओं और उसके संदेश पर चर्चा के लिए किया जाता है। इस मंच पर ओवैसी अक्सर धार्मिक संदेश के साथ समकालीन राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर अपनी राय रखते हैं। इस बार भी उन्होंने कुरान की शिक्षाओं के संदर्भ में यह सवाल उठाया कि क्या कोई भी इस्लामी समाज या सरकार ऐसी कार्रवाई का समर्थन कर सकती है, जिसमें अस्पताल या इलाज करा रहे लोग निशाना बनें।
पाकिस्तान की ओर से हालांकि पहले यह कहा गया था कि उसने किसी नागरिक ठिकाने को नहीं, बल्कि “आतंकी इन्फ्रास्ट्रक्चर” और सैन्य ढांचे को निशाना बनाया। लेकिन अफगानिस्तान की ओर से यह दावा लगातार दोहराया गया कि हमले का शिकार आम नागरिक और नशामुक्ति केंद्र में भर्ती मरीज बने। इसी विरोधाभास के बीच ओवैसी का बयान सामने आया, जिसने इस मुद्दे को भारत के राजनीतिक विमर्श में भी तेज़ी से ला दिया है।
ओवैसी के बयान को केवल एक चुनावी या भावनात्मक टिप्पणी मानना आसान होगा, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा संदेश छिपा है। वह यह कि दक्षिण एशिया में पड़ोसी देशों के रिश्ते सिर्फ सीमाओं और सुरक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि धार्मिक नैतिकता, मानवीय कानून और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़े हैं। जब कोई नेता धार्मिक मंच से ऐसी टिप्पणी करता है, तो उसका असर केवल समर्थकों तक नहीं बल्कि व्यापक राजनीतिक बहस तक जाता है।
फिलहाल, ओवैसी का यह बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में तेज़ी से चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ उनके समर्थक इसे पाकिस्तान की कार्रवाई पर सीधा और साहसी हमला बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ आलोचक इसे तीखी राजनीतिक बयानबाजी के रूप में देख सकते हैं। लेकिन इतना तय है कि मक्का मस्जिद से आया यह बयान सिर्फ एक लाइन नहीं, बल्कि मौजूदा क्षेत्रीय तनाव, अफगानिस्तान की त्रासदी और इस्लाम के नाम पर की जाने वाली राजनीति—तीनों पर एक साथ चोट करता दिखाई दे रहा है।



