
बिहार के भोजपुर जिले में भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन SDM, SDPO और थानाध्यक्ष समेत कुल 11 आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया है। आरा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (CJM) कोर्ट ने सोमवार को आदेश दिया कि सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर 12 अगस्त 2026 तक अदालत के समक्ष पेश किया जाए। इस आदेश के बाद मामले में शामिल अधिकारियों और अन्य आरोपियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।
अदालत की ओर से जिन लोगों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है, उनमें उस समय के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी शामिल हैं। तत्कालीन SDM, SDPO और थानाध्यक्ष की भूमिका को लेकर पहले से ही सवाल उठाए जाते रहे हैं। अब अदालत के इस आदेश के बाद संबंधित अधिकारियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करने की जिम्मेदारी पुलिस-प्रशासन के सामने है। कोर्ट ने इसके लिए 12 अगस्त की समयसीमा तय की है।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला 17 जून 2026 को सामने आया था। भोजपुर जिले के बिलौटी गांव से जुड़े भरत तिवारी की पुलिस और STF की कार्रवाई के दौरान गोली लगने से मौत हो गई थी। पुलिस की ओर से इसे मुठभेड़ बताया गया था, जबकि मृतक के परिजनों और स्थानीय लोगों ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। परिवार की ओर से आरोप लगाया गया कि भरत तिवारी ने पुलिस के सामने हथियार डाल दिए थे और इसके बावजूद उस पर गोली चलाई गई।
इस मामले में एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें भरत तिवारी को पुलिस के सामने हथियार छोड़ते हुए देखा गया था। परिवार और स्थानीय लोगों ने इसी वीडियो को आधार बनाकर पुलिस के एनकाउंटर के दावे पर सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि यदि भरत तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था तो उसके बाद गोली चलाने की जरूरत क्यों पड़ी। इसी सवाल ने पूरे मामले को गंभीर विवाद में बदल दिया।
घटना के बाद मामले की जांच शुरू हुई और शुरुआती जांच में पुलिसकर्मियों की भूमिका को लेकर भी कार्रवाई की गई। एक थानाध्यक्ष, 2 सब-इंस्पेक्टर, एक ASI और एक कांस्टेबल को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। मामले में 2 अलग-अलग प्राथमिकी भी दर्ज की गई थीं। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया और घटना में शामिल पुलिसकर्मियों तथा अधिकारियों की भूमिका की जांच शुरू हुई।
मामला बढ़ने के बाद भरत तिवारी के परिवार की ओर से भी पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई। इस शिकायत में उस समय के जगदीशपुर SDPO और शाहपुर थानाध्यक्ष समेत अन्य पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया था। परिवार लगातार मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता रहा है।
जांच के दौरान पुलिस प्रशासन के स्तर पर भी कई कदम उठाए गए। जगदीशपुर के तत्कालीन SDM संजीत कुमार को उनके पद से हटाकर पटना मुख्यालय से संबद्ध किया गया था। इसी तरह एनकाउंटर के समय जगदीशपुर के SDPO रहे अधिकारी को भी वहां से हटाया गया। इस कार्रवाई के बाद मामले में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका को लेकर जांच और अधिक महत्वपूर्ण हो गई थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक जांच की प्रक्रिया भी शुरू की गई। राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के माध्यम से मामले की जांच कराने का निर्णय लिया गया था। वहीं पुलिस स्तर पर भी घटना की परिस्थितियों, मौके पर मौजूद अधिकारियों और जवानों की भूमिका तथा उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की जा रही है। इस बीच मामले में एक STF जवान की गिरफ्तारी की जानकारी भी सामने आई थी, जिस पर भरत तिवारी को आत्मसमर्पण करने के बाद गोली मारने के आरोपों की जांच की जा रही है। हालांकि, इस संबंध में सामने आई कुछ शुरुआती जानकारी की आधिकारिक पुष्टि का स्तर अलग-अलग रहा है।
अब आरा CJM कोर्ट के ताजा आदेश ने मामले को एक नए चरण में पहुंचा दिया है। 11 आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी होने का अर्थ है कि अदालत ने मामले में आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सख्त कदम उठाया है। 12 अगस्त तक सभी आरोपियों को अदालत में पेश करने का आदेश दिया गया है। ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी और अन्य आरोपी निर्धारित समयसीमा के भीतर अदालत के सामने पेश किए जाते हैं या नहीं।
भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में पुलिस का दावा, परिवार के आरोप, घटना से जुड़ा वीडियो, पुलिसकर्मियों पर हुई कार्रवाई और अब 11 आरोपियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट—इन सभी घटनाक्रमों ने मामले को बेहद संवेदनशील बना दिया है। हालांकि किसी आरोपी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। अंतिम रूप से जिम्मेदारी और आरोपों की पुष्टि जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगी।



