
यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है और कई देशों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच चुका है। हैरानी की बात यह है कि जिस तापमान को भारत और एशिया के कई हिस्सों में सामान्य गर्मी के रूप में देखा जाता है, वही तापमान यूरोप में बड़ी संख्या में लोगों की जान ले रहा है। हाल के दिनों में फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पेन और अन्य यूरोपीय देशों में गर्मी से जुड़ी मौतों के मामलों में तेजी आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे केवल बढ़ता तापमान ही नहीं, बल्कि सामाजिक, भौगोलिक और बुनियादी ढांचे से जुड़ी कई गंभीर वजहें जिम्मेदार हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार यूरोप के अधिकांश देश पारंपरिक रूप से ठंडे मौसम वाले क्षेत्र रहे हैं। यहां के घरों, सार्वजनिक भवनों और परिवहन व्यवस्था को सर्द मौसम को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। यही कारण है कि बड़ी संख्या में आवासीय इमारतों में एयर कंडीशनिंग की व्यवस्था नहीं है। जब तापमान अचानक 40 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुंच जाता है, तो लोगों के लिए शरीर का तापमान नियंत्रित रखना मुश्किल हो जाता है। खासकर बुजुर्ग, पहले से बीमार लोग और अकेले रहने वाले नागरिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह है कि यूरोप की आबादी तेजी से वृद्ध हो रही है। कई देशों में 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या काफी ज्यादा है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की गर्मी सहन करने की क्षमता कम हो जाती है और डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक तथा हृदय संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान कई लोगों की मौत सीधे हीट स्ट्रोक से नहीं होती, बल्कि गर्मी पहले से मौजूद बीमारियों को गंभीर बना देती है, जिससे मृत्यु दर में वृद्धि होती है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार यूरोप में गर्म हवाओं का बड़ा हिस्सा उत्तरी अफ्रीका और सहारा क्षेत्र से आया है। उच्च दबाव वाले मौसम तंत्र ने इन गर्म हवाओं को लंबे समय तक यूरोप के ऊपर रोके रखा, जिसके कारण तापमान लगातार बढ़ता गया। वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी जोड़ रहे हैं। उनका मानना है कि मानव गतिविधियों से बढ़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने ऐसी चरम मौसम घटनाओं की संभावना को पहले की तुलना में कई गुना बढ़ा दिया है।
विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यूरोप दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां तापमान वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। हालिया आंकड़ों के अनुसार फ्रांस में ही गर्मी के कारण हजारों अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं, जबकि जर्मनी, इटली और स्पेन में भी स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव देखने को मिल रहा है। कई स्थानों पर रेल सेवाएं प्रभावित हुई हैं, बिजली उत्पादन घटा है और जंगलों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यूरोप को केवल तापमान वृद्धि से नहीं, बल्कि उससे निपटने की तैयारी से भी जूझना होगा। शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र बढ़ाना, भवनों को गर्मी के अनुकूल बनाना, सार्वजनिक कूलिंग सेंटर विकसित करना और कमजोर वर्गों की विशेष निगरानी करना भविष्य की आवश्यकता बनता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यूरोप में 40 डिग्री तापमान भविष्य में अपवाद नहीं बल्कि सामान्य स्थिति बन सकता है, जिससे मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था दोनों पर गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।



