
परीक्षाओं में पेपर लीक की समस्या से निपटने के लिए इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी ने एक नया सुझाव दिया है। उनका मानना है कि यदि प्रश्नपत्र परीक्षा से काफी पहले तैयार करने के बजाय परीक्षा के दिन ही एक बड़े डिजिटल प्रश्न बैंक से बनाया जाए, तो पेपर लीक कर उसे बेचने का आर्थिक प्रलोभन कम किया जा सकता है। उन्होंने यह विचार 13 अक्टूबर को नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम के दौरान रखा।
नीलेकणी परीक्षा सुधारों के लिए गठित छह सदस्यीय हाई-पावर्ड टास्क फोर्स का नेतृत्व कर रहे हैं। इस समिति को परीक्षा संचालन, सुरक्षा, डिजाइन और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के सुझाव देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। समिति को छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और अन्य संबंधित पक्षों से 50 हजार से अधिक सुझाव मिले हैं। इसकी रिपोर्ट अक्टूबर के अंत तक आने की उम्मीद है।
नीलेकणी के प्रस्ताव के मुताबिक, अलग-अलग विषयों और कठिनाई स्तरों के प्रश्नों का एक बड़ा डिजिटल बैंक बनाया जा सकता है। परीक्षा के करीब आने पर इसी बैंक से डिजिटल माध्यमों की मदद से प्रश्न चुने जाएं और उस दिन के लिए प्रश्नपत्र तैयार किया जाए। उन्होंने यह संभावना भी जताई कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI परीक्षा वाले दिन प्रश्नपत्र तैयार करने में भूमिका निभा सकता है। हालांकि, यह अभी एक प्रस्ताव है, लागू हो चुका नियम नहीं।
इस योजना के साथ कंप्यूटर-बेस्ड टेस्टिंग यानी CBT का विस्तार भी अहम माना जा रहा है। नीलेकणी ने कहा कि देश में करीब 1.5 लाख ऐसे स्थान हैं जहां परीक्षाएं कराई जाती हैं, लेकिन इस नेटवर्क को और बढ़ाने की जरूरत है। ऑनलाइन परीक्षा व्यवस्था अपनाने से प्रश्नपत्रों की छपाई, पैकिंग, भौतिक परिवहन और परीक्षा केंद्रों तक वितरण पर निर्भरता घट सकती है। इससे कागज पर आधारित व्यवस्था में मौजूद कुछ जोखिम कम हो सकते हैं।
हालांकि, CBT अपनाने का अर्थ यह नहीं है कि पेपर लीक का खतरा पूरी तरह खत्म हो जाएगा। डिजिटल व्यवस्था में सर्वर की सुरक्षा, प्रश्नों तक पहुंच के अधिकार, डेटा एन्क्रिप्शन, नेटवर्क की निगरानी और अंदरूनी स्तर पर होने वाली गड़बड़ियों को रोकना जरूरी होगा। परीक्षा केंद्रों पर पर्याप्त कंप्यूटर, भरोसेमंद इंटरनेट, बिजली और तकनीकी सहायता की व्यवस्था भी करनी होगी, ताकि किसी तकनीकी समस्या के कारण छात्रों की परीक्षा प्रभावित न हो।
एक बड़ी चुनौती प्रश्न बैंक की गुणवत्ता बनाए रखना भी होगी। उसमें पर्याप्त संख्या में प्रश्न होने के साथ-साथ विषयों का संतुलित प्रतिनिधित्व, समान कठिनाई स्तर और निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करना होगा। अलग-अलग छात्रों को अलग प्रश्नपत्र दिए जाने की स्थिति में यह भी ध्यान रखना पड़ेगा कि सभी पेपर कठिनाई और पाठ्यक्रम के लिहाज से तुलनीय हों। इन व्यवस्थाओं के बिना केवल डिजिटल तकनीक परीक्षा की निष्पक्षता की गारंटी नहीं दे सकती।
परीक्षा सुधारों पर विचार करने वाली संसदीय समिति भी बड़े और लगातार अपडेट होने वाले प्रश्न बैंक तथा परीक्षा से कुछ समय पहले अंतिम प्रश्नपत्र तैयार करने की सिफारिश कर चुकी है। समिति ने प्रश्नपत्र तैयार करने में योग्य विशेषज्ञों की भूमिका और प्रश्नपत्र बनाने वालों की जांच पर भी जोर दिया है। इससे संकेत मिलता है कि परीक्षा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए प्रश्न बैंक, डिजिटल तकनीक और प्रशासनिक निगरानी को साथ लेकर चलने पर चर्चा हो रही है।
अब सबसे अहम सवाल इन सुझावों को लागू करने का है। नीलेकणी की टास्क फोर्स की रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि प्रश्न बैंक, CBT केंद्रों के विस्तार और तकनीकी सुरक्षा को लेकर क्या ठोस सिफारिशें दी जाती हैं। इन उपायों की वास्तविक सफलता उनके प्रभावी क्रियान्वयन, नियमित ऑडिट और जवाबदेही पर निर्भर करेगी। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि नया फॉर्मूला पेपर लीक को पूरी तरह रोक देगा, लेकिन यह परीक्षा प्रणाली की कमजोरियों को कम करने की दिशा में एक संभावित बदलाव जरूर है।



