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शिवसेना (UBT) में बढ़ी अंदरूनी हलचल

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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी शिवसेना (UBT) के भीतर उठ रहे असंतोष ने सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है। पार्टी के कुछ सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के बीच बढ़ती नाराजगी की खबरों ने उद्धव ठाकरे खेमे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। बताया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद संगठन के भीतर नेतृत्व शैली, राजनीतिक रणनीति और भविष्य की दिशा को लेकर कई नेताओं के मन में सवाल उठ रहे हैं। इसी वजह से पार्टी नेतृत्व अब डैमेज कंट्रोल की कवायद में जुट गया है।

सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में कुछ सांसदों और पदाधिकारियों ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक अपनी नाराजगी पहुंचाई है। इन नेताओं का मानना है कि संगठन के विस्तार और राजनीतिक फैसलों में सभी जनप्रतिनिधियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। वहीं कुछ नेताओं को यह भी चिंता है कि पार्टी लगातार राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है और ऐसे समय में संगठन को और मजबूत बनाने की जरूरत है। इन चर्चाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरणों की अटकलों को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवसेना के विभाजन के बाद से उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को एकजुट बनाए रखने की रही है। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए बड़े राजनीतिक विद्रोह के बाद पार्टी को पहले ही बड़ा झटका लग चुका है। अब यदि सांसदों या वरिष्ठ नेताओं के स्तर पर असंतोष बढ़ता है तो इसका असर भविष्य की चुनावी रणनीति पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व किसी भी तरह के असंतोष को सार्वजनिक संकट बनने से पहले संभालने की कोशिश कर रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच शिवसेना (UBT) के प्रमुख नेता संजय राउत लगातार पार्टी की एकजुटता का दावा कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि पार्टी पूरी तरह मजबूत है और सांसदों के बीच किसी तरह की बगावत जैसी स्थिति नहीं है। राउत का कहना है कि लोकतांत्रिक दलों में विचार-विमर्श और मतभेद स्वाभाविक होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संगठन में टूट की स्थिति पैदा हो गई है। उन्होंने विपक्षी दलों पर अफवाह फैलाने का भी आरोप लगाया।

दूसरी ओर, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का गुट लगातार शिवसेना (UBT) के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नजर बनाए हुए है। पिछले कुछ वर्षों में कई नेताओं के पाला बदलने के बाद ऐसी अटकलें समय-समय पर सामने आती रही हैं कि कुछ और नेता भी राजनीतिक विकल्प तलाश सकते हैं। हालांकि अब तक किसी सांसद ने खुलकर पार्टी छोड़ने की घोषणा नहीं की है।

विशेषज्ञों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में संख्या बल का महत्व हमेशा से निर्णायक रहा है। ऐसे में यदि किसी भी दल के भीतर असंतोष की खबरें सामने आती हैं तो राजनीतिक विरोधी उसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करते हैं। शिवसेना (UBT) के लिए भी यह समय संगठनात्मक मजबूती दिखाने का है, क्योंकि आने वाले समय में राज्य की राजनीति कई नए मोड़ ले सकती है।

फिलहाल उद्धव ठाकरे और उनकी टीम पार्टी के भीतर संवाद बढ़ाने, नाराज नेताओं को मनाने और संगठन को एकजुट रखने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह असंतोष केवल अंदरूनी चर्चा तक सीमित रहता है या फिर महाराष्ट्र की राजनीति में किसी बड़े घटनाक्रम का कारण बनता है। फिलहाल राज्य की राजनीति में नजरें शिवसेना (UBT) के अगले कदम और पार्टी के भीतर चल रहे समीकरणों पर टिकी हुई हैं।

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