
अमेरिका और ईरान के बीच उभरते शांति समझौते ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव ला दिया है। पिछले कई महीनों से युद्ध, प्रतिबंधों और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधाओं के कारण दबाव झेल रहे तेल बाजार को राहत मिलनी शुरू हो गई है। समझौते की खबर सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई और निवेशकों ने आपूर्ति संकट कम होने की उम्मीद जताई। रिपोर्टों के अनुसार ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली, क्योंकि बाजार ने संभावित रूप से बढ़ती तेल आपूर्ति को पहले ही कीमतों में शामिल करना शुरू कर दिया।
सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह रहा कि करीब दो महीने की रुकावट और प्रतिबंधों के बाद ईरानी तेल फिर से अंतरराष्ट्रीय बाजार की ओर बढ़ने लगा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान को तेल और ईंधन की बिक्री फिर से शुरू करने की अनुमति दी जा रही है। इसके साथ ही बैंकिंग, बीमा और परिवहन जैसी सेवाओं में भी कुछ रियायतें दिए जाने की बात सामने आई है, जिससे ईरानी तेल निर्यात को गति मिल सकती है।
तेल बाजार पर सबसे बड़ा प्रभाव होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर देखने को मिला है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रणनीतिक मार्ग से होकर गुजरता है। युद्ध और तनाव के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं। अब अमेरिका-ईरान समझौते और जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की दिशा में बढ़ते प्रयासों ने बाजार को राहत दी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक समझौते के बावजूद सामान्य व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह बहाल होने में अभी समय लग सकता है।
बाजार विश्लेषकों का मानना है कि तेल की कीमतों में आई गिरावट केवल शांति समझौते का परिणाम नहीं है, बल्कि निवेशकों को यह भी उम्मीद है कि ईरान के पास मौजूद बड़ी मात्रा में तेल भंडार जल्द ही वैश्विक बाजार में पहुंच सकता है। इससे आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव बना रहेगा। कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि ईरान के पास करोड़ों बैरल तेल का भंडार मौजूद है, जिसे निर्यात के लिए तैयार रखा गया था।
हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। कई शिपिंग कंपनियां और बीमा एजेंसियां अभी भी सुरक्षा स्थिति का आकलन कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्री मार्गों पर नियमित यातायात बहाल होने और सुरक्षा जोखिम कम होने में कुछ सप्ताह या महीने लग सकते हैं। यही वजह है कि तेल बाजार में राहत के बावजूद सतर्कता बनी हुई है।
भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह घटनाक्रम सकारात्मक माना जा रहा है। यदि कच्चे तेल की कीमतें नीचे बनी रहती हैं तो इससे पेट्रोलियम आयात बिल कम हो सकता है, महंगाई पर दबाव घट सकता है और आर्थिक गतिविधियों को भी समर्थन मिल सकता है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में आई इस नरमी को भारत सहित कई देशों के लिए राहत भरी खबर माना जा रहा है।
फिलहाल वैश्विक बाजार की नजर अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित समझौते के अंतिम स्वरूप पर टिकी हुई है। यदि समझौता पूरी तरह लागू हो जाता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य हो जाती है, तो आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है। वहीं किसी भी कूटनीतिक या सैन्य बाधा की स्थिति में बाजार में फिर से उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।



